उन्हें सुधरने का मौका देना चाहिए, पर जो अपराधी सुधरना नहीं चाहते, उनके लिए समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए, रिपोर्ट योगेश मुदगल

राजनीति में अपराध के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए और अपराध के अंत के लिए हर मुमकिन कोशिश सरकारों को करनी ही चाहिए। इसी कड़ी में गैंगस्टर-नेता अतीक अहमद के बेटे असद अहमद की मुठभेड़ में हुई मौत को देखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश पुलिस के विशेष कार्य बल की अगर प्रशंसा हुई है, तो इसका आधार यही है कि राजनीति या समाज में अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं है। उमेश पाल हत्याकांड के बाद से जिस तरह से असद अहमद भागा-भागा फिर रहा था, उसमें पहले से ही यह आशंका थी कि अगर मुठभेड़ हुई, तो पुलिस अंतिम विकल्प आजमाने में पीछे नहीं हटेगी। पुलिस के विशेष कार्यबल ने मुठभेड़ को झांसी में अंजाम देकर वाकई प्रदेश के अन्य अपराधियों को साफ संदेश दे दिया है कि गुंडागर्दी को सरकार कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एनकाउंटर की सूचना के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था पर एक बैठक की अध्यक्षता की और पुलिस महानिदेशक, विशेष महानिदेशक (कानून व्यवस्था) और पुलिस टीम को बधाई दी है, तो कोई आश्चर्य नहीं। पिछले महीने से ये हत्याभियुक्त पुलिस के लिए चुनौती बने हुए थे, अब स्थिति बदलेगी, पुलिस इसे बड़ी सफलता मान सकती है।
उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने असद अहमद के साथ मुठभेड़ की घटना को ऐतिहासिक करार दिया है और अन्य अपराधियों को भी संदेश देने का दावा किया है। अपराधियों के खिलाफ सख्ती उत्तर प्रदेश में नई नहीं है। मुख्यमंत्री की छवि अपराध विरोधी कार्रवाइयों के कारण रही है और इसका लाभ उन्हें पिछले विधानसभा चुनाव में भी मिला था। इसमें कोई शक नहीं कि पिछली कुछ सरकारों के समय अपराधियों का मनोबल ऊंचा रहा है। अपराधी धड़ल्ले से चुनाव भी जीतते रहे हैं और कहीं न कहीं, कभी न कभी उन्हें शासन-प्रशासन की उदासीनता का लाभ भी मिलता रहा है। अब अगर वाकई अपराधियों का युग खत्म हो रहा है, तो इससे अच्छी और कोई बात हो नहीं सकती। नेताओं को अब तेरा अपराधी और मेरा अपराधी के पैमाने से ऊपर उठ जाना चाहिए। अपराध को जाति, धर्म, वर्ग के आधार पर बढ़ावा देने पर शर्म आनी चाहिए। असली सफलता तो तब है, जब न शासन अपराधियों का बचाव करे और न प्रशासन कभी उनकी कारस्तानियों से आंखें मूंदे।
अपराधियों को आत्म-समर्पण के लिए विवश करना सरकार की सही रणनीति है। उन्हें सुधरने का मौका देना चाहिए, पर जो अपराधी सुधरना नहीं चाहते, उनके लिए समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह हमारा दुर्भाग्य है कि अनेक ऐसे न सुधरने वाली श्रेणी के आला अपराधी भी भारत में माननीय सांसद व विधायक तक हुए हैं, क्या इसके लिए कोई एक नेता या एक पार्टी ही दोषी है? निस्संदेह, भारतीय राजनीति के इस चरित्र को बदलना चाहिए। हर मुठभेड़ की जांच की अपनी परंपरा है, इसकी भी जांच होगी। पुलिस को किसी भी तरह की संविधान विरोधी मनमानी से रोकना चाहिए। जेलों में अपराधियों को सुविधा देने की व्यवस्था का क्या अंत हो चुका है? पुलिस खुद को सुधार ले, तो एक भी अपराधी बच नहीं सकता। काश! आज बेटे की मौत पर रो रहा वह दागी पिता पहले चेत जाता, तो न बेटे के हाथ खून से रंगते और न मुठभेड़ की नौबत आती। उस दागी अभिभावक के साथ ही, शासन-प्रशासन को भी जनता के अभिभावक स्वरूप में सोचना चाहिए कि कानून से खिलवाड़ का समापन कैसे हो।