सीएमओ कार्यालय एटा से पत्रावलियां गुम, कई अखबारों के बिल और वर्क आर्डर गायब
आखिर क्यों नहीं करा रहे सम्बंधित लिपिक पत्रावलियां चोरी होने की एफआईआर

एटा। मुख्य चिकित्सा अधिकारी एटा का कार्यालय यूं तो अधिकतर अपनी कार्य प्रणालियों के लिए चर्चित रहता है। यहाँ न तो शासन- प्रशासन के नियम कानूनों को तबज्जो दी जाती है और न कार्यालय को कार्यालयीय नियमों के अनुसार संचालित किया जाता है। कार्यालय में पत्रावलियों का रख- रखाव ऐसा नहीं है कि वे आवश्यकता पड़ने पर मिल सकें। खोई हुई पत्रावलियों को कार्यालय में गुम होना बताया जा रहा है। कार्यालय में पैसा ही चलता और बोलता है। उसी पैसे के चलन के कारण लिपिकों को मुख्य चिकित्सा अधिकारी तो छोड़ए, स्थानीय सांसद, विधायक, सरकार के स्वास्थ्य मंत्री तक का भय नहीं है। कार्यालयीय अनियमितता पर अगर लिपिक को कहा जाए तो वह यही कहता है कि जाओ, कर दो शिकायत। किससे करोगे, डीएम, स्वास्थ्य मंत्री या मिशन निदेशक (एन. एच. एम.) से, जांच तो सीएमओ आफिस में ही आएगी। उखड़वा लेना, क्या उखड़वाओगे।
पिछले 3-4 वर्षों से सीएमओ कार्यालय में विभिन्न योजनाओं के प्रचार-प्रसार के विज्ञापन सम्बंधी पत्रावलियों का चोरी होना जारी है, जिसे सरकारी भाषा में गुम होना कहा जा रहा है। यदि लिपिक पत्रावली चोरी होने की बात कहता है तो चोरी शब्द अपराध की श्रेणी में आता है और गुम होने का तात्पर्य यह निकाला जाता है कि पत्रावली कार्यालय में तो है लेकिन मिल नहीं रही है। गुम शब्द के प्रयोग से लिपिक अपनी अकर्मण्डयता/कर्तव्यहीनता से बचा रहता है वहीं, जिस वर्क आर्डर से जिन फर्मों ने काम किया होता है उनका भुगतान नहीं हो पाता है।
सीएमओ कार्यालय में अखबारों से जुड़े व्यक्तियों का एक ऐसा रैकिट काम कर रहा है जो एक-दो अखबारों को छोड़कर अन्य अखबारों के मूल बिल और वर्क आर्डर (विज्ञापन आदेश) चोरी कर लेता है ताकि अन्य अखबारों का जब पिछला भुगतान नहीं होगा तो वह आगे न तो विज्ञापन लेने आयेंगे और न छापेंगे, फिर सीएमओ कार्यालय से निर्गत होने वाले विज्ञापनों पर उनका एकाधिकार बना रहेगा। विगत 2-3 वर्षों से यही चल रहा है। एटा जनपद से प्रकाशित दैनिक अखबारों को भी विज्ञापन नहीं दिए जा रहे जबकि मंडल से प्रकाशित समाचार पत्र के साथ समस्त स्थानीय समाचार पत्रों में भी क्रमानुसार योजनाओं के प्रचार प्रसार हेतु विज्ञापन प्रकाशित कराया जाना चाहिए। यह क्रम पिछले मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के समय में चला लेकिन वर्तमान मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने दो-तीन समाचार पत्रों के परिजनों को अपने कार्यालय में लगा रखा है जो अन्य समाचार पत्रों के साथ विद्वेष की भावना रखते हुए इन गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय से वर्ष 2019-20 तथा 2020-21 में समय-समय पर समाचार पत्रों के रोस्टर के अनुसार विभिन्न योजनाओं के प्रचार-प्रसार हेतु राष्ट्रीय कोहिनूर समाचार पत्र को 6 विज्ञापन प्रकाशित करने हेतु वर्क आर्डर जारी किये गए। समाचार पत्र कार्यालय ने सभी विज्ञापनों को प्रकाशित कर जिला सूचना अधिकारी से विज्ञापन दर प्रमाणित कराकर वर्क आर्डर की फोटो प्रति के साथ तत्कालीन सम्बंधित लिपिक को उपलब्ध कराए थे। सभी विज्ञापनों का प्रकाशन महीनों के अंतराल से स्वास्थ्य विभाग की विभिन्न योजनाओं/कार्यक्रमों में किया गया है तो सम्भवतः यह तो निश्चित है कि उन योजनाओं/ कार्यक्रमों की पत्रावलियां और बिल भी अलग-अलग ही होंगे। उन सभी पत्रावलियां का कार्यालय में गुम हो जाना और लिपिक के द्वारा मांगने पर बिलों का दो बार कार्यालय में जमा कराया जाना, उसके बाद भी तीसरी बार बिल और वर्क आर्डर की प्रति का लिपिक द्वारा मांगा जाना एक गम्भीर साजिश का परिणाम है।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय कोहिनूर के प्रतिनिधि ने गत वर्ष जुलाई 2021 में जब पहली बार भुगतान हेतु सीएमओ कार्यालय से
सम्पर्क किया तो सम्बंधित लिपिक ने बिल न मिलने की बात कहते हुए बिलों की द्वितीय प्रतियां मांगी जिन्हें वर्क आर्डर की प्रतियों के साथ दि0 21 जुलाई 2021 को उपलब्ध करा दिया गया जिसमें बिल नं0 19, 23, 27, 29 और 32 संलग्न थे। सीएमओ कार्यालय में सक्रिय रैकिट ने बिल पुनः गायब कर दिए तो उपरोक्त सभी बिल दि0 14 मार्च 2022 को डिस्पैच लिपिक से रिसीविंग प्राप्त कर जमा करा दिए। रैकिट फिर सक्रिय हुआ और 14 मार्च 2022 को जमा कराये बिल फिर गुम कर दिए। समाचार पत्र के प्रतिनिधि ने दि0 22 अप्रैल 2022 को पुनः बिलों की द्वितीय प्रतियां सीएमओ कार्यालय के डिस्पैच लिपिक को उपलब्ध कराकर रिसीविंग प्राप्त कर ली। चौथे दिन दि0 26 अप्रैल 2022 को मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय से पत्रांक-सी.एम.ओ./ बिल भुग0/2022-23/ 4285 के पत्र द्वारा अवगत कराया गया कि बिलों में वर्क आर्डर संलग्न नहीं हैं अर्थात एक बार फिर वर्क आर्डर गुम कर दिए गए। दि0 2 अगस्त 2022 को पुनः सीएमओ कार्यालय के डिस्पेच लिपिक को वर्क आर्डर (विज्ञापन आदेश) के साथ बिल पुनः उपलब्ध करा दिए गए, लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि 3-3 बार बिलों की चोरी हो जाने की घटना को सीएमओ कार्यालय बिना कार्यवाही के ‘गुम हो जाने की’ कहकर हजम कर जाता है। राष्ट्रीय कोहिनूर के बिलों के साथ ही दैनिक लोक भारती कानपुर के प्रतिनिधि वरिष्ठ पत्रकार नेत्रपाल सिंह ने बताया है कि सीएमओ कार्यालय से उनका बिल भी गायब कर दिया गया है।
बिलों के भुगतान हेतु सीएमओ उमेश चन्द्र त्रिपाठी से सम्पर्क किया जाता है तो अधिकांशतः उनका टालमटोल रवैया रहता है। उनका कहना है कि वे अपने समय में दिए गए विज्ञापन का ही भुगतान कराएंगे। स्थिति यह है कि अपने समय में विज्ञापन दिया नहीं और पिछले बिलों का भुगतान करेंगे नहीं। एटा सीएमओ कार्यालय के विज्ञापनों की स्थिति तो यह है कि अनेकों योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार हेतु आये बजट की बड़ी धनराशि को कुछ समाचार पत्रों के कलैंडरों में छपवाकर खर्च कर दिया जाता है। आखिर इन कलैंडरों के विज्ञापन को ही अखबार मानकर भुगतान कर दिया जाता है तो यह निहायत ही नियम विरूद्ध है। यदि इन समाचार पत्रों को जारी हुए विज्ञापनों की प्रचार धनराशि थी तो उनका प्रतिवर्ष भुगतान क्यों नहीं कराया गया और यदि प्रचार धनराशि नहीं थी तो समाचार पत्रों को विज्ञापन क्यों जारी किये गये। सीएमओ साहब अपने कार्यालय और विभाग को अपने निजी प्रतिष्ठान की तरह संचालित कर रहे हैं।
सम्बंधित लिपिकों के द्वारा दबी जुबान बताया तो यह भी जा रहा है कि कुछ समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों ने सीएमओ कार्यालय में अपने परिजनों को संविदा पर लगवा दिया है उन्हीं के द्वारा सीएमओ कार्यालय से बिलों और पत्रावलियों की हेरा-फेरी की जा रही है। खुलकर उनका नाम लेना लिपिकों के लिए इसलिए सम्भव नहीं है क्योंकि समाचार पत्रों से जुड़े कर्मचारियों के सीएमओ साहब से गहरे ताल्लुकात हैं।
सीएमओ कार्यालय के विज्ञापन भी उन्हीं समाचार पत्रों में प्रकाशित होते हैं जो विज्ञापन प्रकाशित कर उस दिन समाचार पत्र का जनपद में वितरण न करायें। रोस्टर के अनुसार जनपद के अन्य समाचार पत्रों को विज्ञापन न देना तो धृतराष्ट्र की दृष्टि बन गया है। आलम तो यह है कि एक पत्रकार लिपिकों से ठेके पर विज्ञापन ले रहे हैं, वे दूसरे समाचार पत्रों को फिफ्टी-फिफ्टी का सौदा कर विज्ञापन खुद दे रहे हैं। आखिर सीएमओ साहब अपने कार्यालय में कब तक अंधेरा कायम रखेंगे।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने यदि समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों के परिजनों को अपने कार्यालय और जिला मुख्यालय से दूर स्थानांतरित नहीं किया तो निकट भविष्य में अन्य समाचार पत्रों के प्रतिनिधि आंदोलनात्मक कदम उठा सकते हैं।