
पत्रकार व पत्रकारिता का गिरता स्तर
भले ही हम चाहे किसी संगठन से जुड़े हुए हो अथवा किसी न्यूज नेटवर्क परिवार से,हमलोगों का भला तभी संभव है जब अपनी मानसिकता को सुधार ले,अन्यथा स्थिति इससे भी बदतर हो सकती है।
अब बात करते हैं मुद्दे की ।
जब पत्रकारिता मिशन के रूप में नहीं अपनाएगे तब तक कुछ भी संभव नहीं, क्योकि आज जितने भी मीडिया संस्थान हैं वह सब कारपोरेट घरानो का बर्चस्व है, उन्हे सिर्फ कमाई चाहिए तब कैसे संभव है कि मिशन रूपी पत्रकारिता को पँख लग पाए।
गुलाम देश में पत्रकारिता मिशन के रूप में होती आई है, ठीक वही स्थित आज भी है, आज हम पार्टियों के गुलाम बन चुके।
मिशन केवल चाटुकारिता ही बन गई है, यह स्थित हरेक काल खंड में बनती विगड़ती रहती है, जब गणेश शंकर विद्द्यार्थी जैसे मिशनरीज पत्रकार हुआ करते थे तब भी ब्रिटिश हुकूमत चाटुकार पत्रकारों की फौज हुआ करती थी जो भारतीयों की लाशो पर चढ़कर मलाई मारते थे ।
वही दौर आज भी है चाटुकार मलाई मारते हैं कलमकार लाठी खाते हैं।
कलमकार को दोनो ओर से लाठी पड़ती है संस्थान से भी और सरकार से भी।
जब हमने मिशन रूपी आग को चुनी है तो तपना तो हमे ही पड़ेगा,तपकर ही सोना निखरता है।
अगर निखरना है तो सभी कष्ट झेलने होंगे।
सिद्धता तभी प्राप्त होती है जब कष्टों को आदत मे डालते हैं।
हमारा काम है बहरो को सुनना