
#जनहितमय,-बिभीषणों का महोत्सव है या इलेक्सन, ये तो सबको पता है पर पब्लिक के लिये तो ये शुरुआत में ही मौत परोसते चले आ रहे है–
कोरोना बचाव मे पब्लिक को सख्त हिदायत हैकि मास्क और सोशल distance का पालन करे लेकिन खुलेआम मंच पर जो जश्न मनाया जा रहा है वह सर्मनाक ही नहीं सजाके पात्र है,हर भविष्य का निर्माण बक्त की कोख मे पलता है,पर इन जुवानी योद्धाओं का भविष्य इनके दिखावे और और मुंह मिट्ठू—–ड्रामा वही और वही भुक्तभोगी दर्सक आगे क्या होगा वह तो अभी बक्त की कोख मे पलता भ्रूण है,लेकिन कृत्य सर्मनाक है जिनसे सही दर्सक पूंछना चाहता हैकि पांच सालके बाद जो सिंहासन डामाडोल हुये है उनपर एक सार्थक इस्टेटमेंट देने की जरूरत है, सत्ताभोगियो जिस थाली मे खाते रहे उसी थाली मे छेद करके निकलते बने विस्वास से गिरे हुये,हुये इंसान का कोई भरोसा नहीं हो सकता कि आज सिंघासन पर चमकने के लिये इमान बेचर दल बदल दिया कलको देश और आवाम बेच सकते है,किसी भी राजनीतिक दल बदलना इतनी बुरी बात नहीं हो सकता है जितना कि उसका मखौल उड़ाना होता है पब्लिक पूछती है इन दल बदलुऔं से पार्टी मे आप पांच साल पूरे होने के बाद ही आपको उन पार्टियों मे कमी नजर क्यों आई काश यह कृत्य पहले होते तो जनहित मे सामिल हो सकता था आज सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ हितकी राजनीति पब्लिक की आँखों मे धूल झोंकने के लिये हो रही है।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।