किरायानामा 11 महीने का ही क्यों?

आमतौर पर यह भी देखा जाता है कि जब भी किसी मकान या जमीन को किराए पर दिया जाता है तो मकान मालिक 11 महीने का किरायानामा बनाता है जिससे लोगों को यह लगने लगा है कि किरायानामा 11 महीने का ही होता है जबकि यह बात ठीक नहीं है।
11 महीने का किरायानामा जैसी चीज कानून में कहीं कोई उल्लेखित नहीं मिलती है। यह तो लोगों द्वारा बनाई गई एक प्रथा है। कोई भी किरायानामा 11 महीने का भी हो सकता है और 11 महीने से कम का भी हो सकता है और 50 वर्ष तक का भी हो सकता है और एक अनिश्चित समय के लिए भी हो सकता है। इसके लिए कोई निश्चित समय नहीं है पर कोई भी संपत्ति को 11 महीने से अधिक समय के लिए किराए पर दिया जाता है तब ऐसी संपत्ति के पट्टे का रजिस्ट्रेशन कराना होता है।
इसका उल्लेख भारतीय रजिस्ट्रेशन एक्ट के अंतर्गत मिलता है जहां यह स्पष्ट रुप से लिखा हुआ है कि अगर 11 महीने से अधिक समय के लिए किसी संपत्ति को किराए पर दिया जाता है तब ऐसी स्थिति में उस किरायानामा को रजिस्टर कार्यालय में रजिस्टर्ड करवाया जाएगा। अब यहां पर रजिस्ट्रेशन का काम थोड़ा महंगा होता है, वहां पर स्टांप शुल्क देना होता है रजिस्ट्रेशन का शुल्क देना होता है और फिर किरायानामा रजिस्टर्ड होता है तभी उसे कानूनी मान्यता मिलती है। यहां पर लोग किरायानामा की रजिस्ट्री से बचने के लिए यह विकल्प इस्तेमाल करते हैं कि किरायानामा को 11 महीने से अधिक का बनाते ही नहीं है और किरायानामा में यह लिख देते हैं कि 11 महीने के बाद किराया कितना रहेगा और हर साल किराए में कितनी बढ़ोतरी होगी इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि एक बार किरायानामा बना लेने से अगली बार बनाने की आवश्यकता नहीं होगी और अगली बार मौखिक रूप से ही किरायानामा रहेगा।
एक बार का किरायानामा साक्ष्य के रूप में काम आ जाता है इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी संपत्ति का कब्जा किसी दूसरे व्यक्ति को एक किराएदार की हैसियत से दिया गया है और उसमें एक निश्चित धनराशि मकान मालिक द्वारा तय की गई है जो किराए के रूप में किराएदार द्वारा दी जाएगी। इसके अलावा 11 महीने के किरायानामा जैसी कोई भी चीज कानून में कहीं भी उपलब्ध नहीं है यह केवल रजिस्ट्री से बचने का एक उपाय मात्र है। किरायानामा को एक हजार या कम से कम ₹500 के नॉन जुडिशल स्टांप पर लिखकर किसी नोटरी वकील से तस्दीक करवाया जा सकता है। उसकी तस्दीक करने से इस किरायानामा को कानूनी मान्यता मिल जाती है। अंत में हम यह स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि किसी भी संपत्ति का किराएदार उसका मालिक तब तक नहीं हो सकता है जब तक वह संपत्ति को खरीदता नहीं है या दान के रुप में या वसीयत के रूप में हासिल नहीं करता है। केवल एक किराएदार की हैसियत से वह संपत्ति का मालिक कभी भी नहीं बन सकता। संपत्ति का मालिक बनने के लिए संपत्ति को खरीदना पड़ता है यह दान के जरिए लेना होता है या फिर वसीयत के जरिए संपत्ति को प्राप्त करना होता है। एक किराएदार के रूप में संपत्ति कभी भी नहीं मिलती है। किराएदार को संपत्ति पर केवल एक उपभोग करने का अधिकार प्राप्त होता है और उसके बदले भी उसे एक निश्चित धनराशि संपत्ति के मालिक को देना पड़ती है।
11 महीने के किराया अनुबंध जैसी चीज भी कानून में नहीं है यह केवल रजिस्ट्री से बचने का एक उपाय मात्र है। यदि एक लंबे समय के लिए किसी व्यक्ति को मकान किराए से दिया जाए तब एक पट्टा रजिस्टर्ड करवाया जाना चाहिए जैसे कि सरकार अपनी संपत्ति जब भी किसी व्यक्ति को किराए पर देती है तब उससे एक निश्चित अवधि के लिए एकमुश्त राशि लेकर उसे पट्टा लिखकर दे देती है। जैसे कि अनेक फैक्ट्री और टॉकीज सरकार द्वारा दी गई लीज की जमीन पर चल रहे हैं। सरकार ने उन्हें 100 वर्ष या 50 वर्ष के लिए वह संपत्ति एक पट्टा लिख कर दिया है। वह लोग उस संपत्ति के मालिक नहीं है उन्होंने सरकार को एक निश्चित धनराशि 100 वर्ष या 50 वर्ष के लिए दी है उसके बाद उनका उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है।