शुक्र है यूपी में चुनाव है।” – @रवीश कुमार

वरना किसी का भत्ता नहीं बढ़ता, सबके खाते में भत्ते का पैसा नहीं जाता। भर्ती नहीं निकलती। आधे को ज्वाइनिंग नहीं मिलती। किसी को सातवाँ वेतन आयोग नहीं मिलता। 2001 से पहले वाले संविदा कर्मियों के नियमित होने के आदेश नहीं आते। रद्द परीक्षा इतनी जल्दी दोबारा नहीं होती। किसी हर तरह से लोगों के खाते में पैसा देकर, झोलेमें नून तेल देकर जनता को अपने पाले में किया जा रहा है। पाँच साल तक इन मुद्दों को लटका कर रखो, आख़िरी वक्त में भत्ता बढ़ाओ, पेंशन बढ़ाओ, खाते में पैसा दो। अगर ये चुनाव न होते तो जनता के पास मोल भाव की यह शक्ति कहाँ से आती। महंगाई और बेरोज़गारी से परेशान जनता को तीन चार महीने के लिए खाते में कुछ पैसा देकर हवा बनाने की यह तरकीब जीत दिला देगी लेकिन चुनाव के बाद हवा ग़ायब हो जाएगी। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 19 साल नौकरियाँ देने का वादा किया था। किसी को पता है पहले साल में कितनी नौकरियाँ मिली हैं?