खुलासा ! जेल में परिजनों से मिलने के लिए 200 रुपये वसूली, बंदियों ने बताया पांच हजार रुपये भी लेते हैं

यूपी (फर्रूखाबाद) : खुलासा ! जेल में परिजनों से मिलने के लिए 200 रुपये वसूली, बंदियों ने बताया पांच हजार रुपये भी लेते हैं

फर्रूखाबाद जेल के डिप्टी जेलर की कार्यशैली से बंदियों में नाराजगी है। आरोप है कि मुलाकात के एवज में 200 रुपये वसूले जाते हैं। दिवाली पर बंदियों के लिए स्पेशल भोजन भी नहीं बनाया गया। कैदी के मौत के बाद आक्रोश की चिंगारी भड़क गई। जिला जेल में तैनात डिप्टी जेलर शैलेश कुमार सोनकर की कार्यशैली के कारण बंदियों में गुटबाजी हो गई थी। बड़ी संख्या में बंदी नाराज थे। डिप्टी जेलर पर बंदियों से समान व्यवहार न करने का आरोप भी लगाया। जेल में एक माह में बंदी की चार मुलाकात कराई जाती हैं। बंदियों का आरोप था कि प्रत्येक मुलाकाती से दो सौ रुपये लिए जाते हैं। कोरोना के बाद दो वर्ष बाद परिजनों से मुलाकात शुरू हुई। किंतु वसूली के चलते सभी की मुलाकात नहीं हो पा रही है। बंदियों की नाराजगी बड़ी वजह यह भी है। जिला जेल में मशक्कत काटने के एवज में प्रति बंदी से पांच हजार रुपये लिए जाते हैं। मुलायजा में ड्यूटी लगवाने के लिए बंदी रक्षकों में होड़ रहती है। जेल की कैंटीन में सिगरेट, पान मसाले से लेकर सभी सामान आसानी से बंदियों को मिला जाता है।

ग़ौरतलब है कि जिला जेल में डिप्टी जेलर की कारगुजारी के चलते डेढ़ माह पहले बंदियों ने नाश्ता व खाना खाने से इनकार कर दिया था। जानकारी होने पर जेल प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। जेलर अखिलेश कुमार ने बंदियों को किसी तरह समझा कर चार घंटे बाद मना लिया था। इसके बाद भी कई बंदियों ने खाना नहीं खाया था।

नाम ना छापने की शर्त पर जिला जेल से जमानत पर छूटे एक बंदी ने बताया कि जेल में भोजन की गुणवत्ता भी बहुत ही खराब है। अक्सर सब्जी में कीड़े निकलते हैं। आटा भी ठीक नहीं होता है। इससे रोटी सही नहीं बनती है। दाल के नाम पर पानी दिया जाता है, उसमें दाल बहुत ही कम होती है। जिला जेल के अस्पताल से बंदियों को बिना रिश्वत लिए हायर सेंटर में रेफर नहीं किया जाता है। कई बंदी ले देकर रेफर करा भी लेते हैं तो पुलिस लाइन से फोर्स नहीं मुहैया कराया जाता है। बंदी के परिजनों को पुलिस लाइन के गणना कार्यलय में जुगाड़ लगानी पड़ती है। इसके बाद ही फोर्स भेजा जाता है।

करीब डेढ़ माह पूर्व मोहम्मदाबाद क्षेत्र का बंदी हाइड्रोसील की वजह से परेशान था। वह लोहिया अस्पताल भेजने के लिए जेल के अधिकारियों से गुहार लगाता रहा। लेकिन उसकी नहीं सुनी गई। बाद में उसे जमानत मिल गई थी। उसने बताया कि जेल के अस्पताल में बिना रुपये दिए किसी भी बंदी को इलाज नहीं मिलता है। उसका भी इलाज नहीं हो सका। जमानत पर बाहर आने पर इलाज कराया।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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