आवारा दोस्त ( लघुकथा)

कोचिंग से लौटते हुए आज उसको देर हो गई । शाम गहरी होने लगी थी । गांव से 11 कि. मी. साइकल से रोज शहर जाना होता है उसको मेडिकल की कोचिंग के लिए ।
मुख्य सड़क पार करते ही वो एक गली में चल दी । शायद बिजली चली गई थी इसलिए स्ट्रीट लाइट नहीं जल रही थी । गली में अंधेरा था । गली पार करते ही चॉल आ जायेगा जहाँ उसका घर है । लेकिन ये इलाका बेहद सुनसान रहता है । संगीता इन सब से बेखौफ अपने ही अंदाज में चल रही थी। कि अचानक गली से चलते हुए उसे एक ओर दो लडके दिखाई दिए । संगीता उन्हें अनदेखा कर आगे बढ़ गई किन्तु कुछ दूर चलने पर उसे अपने पीछे आते जूतों की आवाजे सुनाई दी ।
इससे पहले कि वो पैडल मार कर गति तेज करती , कि अचानक एक हाथ ने आगे आकर उस की साइकल का हैंडिल पकड़ कर लिया और दूसरे ने उसे साइकिल से खींच लिया । उसके मुंह से एक चीख निकली ही थी कि उसके मुंह को लड़के ने कसकर बंद कर दिया । तभी दूसरे हाथ ने उसके पेट पर पकड़ बना ली। वो एक दम से चौंक उठी और हाथ हटाने की कोशिश करने लगी लेकिन किसी ने आ कर उसे पैरो से पकड़ लिया । वो खुद को आज़ाद करने की नाकाम कोशिश करने लगी। अब तक उसे सब समझ आ चुका था। डर के मारे उसके माथे पर हल्का पसीना आ गया था।
अगले ही पल वो दोनों संगीता को लेकर उस अंधेरे वाली गली से आगे आ चुके थे।, जहा घर बिल्कुल भी नहीं थे । उस लडके ने हाथ से संगीता का मुंह दबाया हुआ था जिससे वो किसी को आवाज़ भी नहीं दे पा रही थी। बस उसकी दबी हुई गूं -गूं आवाज निकल पा रही थी । इस पल उन दोनों की आंखो में एक वहशी इंसान साफ नज़र आ रहा था।
अनायास संगीता ने महसूस किया कि लड़कों की पकड़ ढीली हो गई है । एक लड़के की चीख भी सुनी उसने । उनकी पकड़ संगीता पर जैसे ही ढीली पड़ गई , वह ख़ुद को छुड़ा कर भागती हुई उस सुनसान गली से बाहर आ गई । अपने कपड़े ठीक किये और गिरी हुई साइकिल उठा कर जाने लगी । तभी उसको ख्याल आया , कम से कम उस तीसरे साया को धन्यवाद तो कह दे जिसने उसकी जान बचाई । वरना आजकल परायों के लिए कौन ख़ुद को मुसीबत में डालता है । वह तीसरा साया उसके पास आ कर खड़ा हो गया । उसे देखते ही संगीता ने आश्चर्यजनक खुशी जाहिर करते हुए बोली–” तुम?? “
संगीता अपने घुटनों पर बैठ गई और प्यार से गले लगा लिया। बैग में से बिस्कुट का पैकेट निकाल कर रोज की तरह आज भी उसे दिया ।
उसके दोस्त ने भी मासूमियत से संगीता की ओर देखते हुए आंखों ही आंखों में कहा –” आते जाते मेरे लिए रोज बिस्कुट लाना नहीं भूलती न !!
और धन्यवाद देने के लिए अपनी पूंछ जोर-जोर से हिलाने लगा ।
डॉ निरूपमा वर्मा
एटा -उत्तर प्रदेश