
#परिवर्तन की लहूलुहान तस्वीर–
हमलावर राजनीति, बजूद किसी का भी निचोड़ देती है—
खबर एटा से—
गुम होती राजनीति मे वोटर भी गुमराह पर चल पडा़ है,आज हर पार्टी के दाव पेच राजनीति से कोसों दूर है याद आते है वह दिन जब चुनाव आता था तो पर्व जैसा माहौल हुआ करता था शहर और गांव मे,और आज के बदलते परिवेश मे दहशतें, सत्ताएं माई बाप हुआ करती थी जोकि असली माता पिता से भी ज्यादा अजीज दिलों मे सम्मान रखती थी आज ऐसा लगता है कि गिद्धों के सामने पडे़ मास की खैचातानी——पब्लिक मे भी अपना हित अहित देखने की क्षमता खत्म हो रही है जब बज्रपात सा अहित टूटता है ऊपर तो सिर्फ अपना ही जख्म दिखाई देता है जबकि जख्मी पूरा समाज हो जाता है,बिकते मौहरे हित अहित से परे होते है गुलाम सिर्फ गुलामी की ओर चल पड़ते है नाकि अपने अधिकारों और सम्मान इमेज तक पब्लिक के खून पशीने की कमाई का बंदर बांट पब्लिक की आँखों के सामने होता रहता है, और हम खामोशी से देखते सहते रहते है, क्यों कि पावर बिक जाती है और पब्लिक कराहकर रह जाती है,कर्म से 90प्रतिशत दूर आदमी स्वार्थ मे डूब जाता है कुछ नशीब हो भी जाए तो सत्ताएं तेरे मेरे की की दीवार अडा़ देती है देखकर भी ना देखने की बीमारी ने भूँख मे भूँख तबाही मे तबाही और दहशत मे दहशत बसा दी राजनीति की कुर्सियों पर धर्म लिखकर इंसानों की ताकत को कमजोर कर दिया अपने कर्म के फर्ज से धोखा करने बाले गद्दारों ने पब्लिक और तबाही स्थाई रण युद्ध बना दिया है, जबकि ना राजनीति गुलाम है ना वोट लेकिन ये हो रहा है जिसकी लाठी उसकी भैंस—बक्त के इंतजार मे अब आदमी नही रहता घात लगाये अपनी अपनी बारी का—चाहे सत्ता मे है या सत्ता से दूर पब्लिक मे दहशती जुवांनी जंग से माहौल खराब किया जाता है,अपनी अपनी बारी मे पब्लिक के अधिकारों की नहीं खुंदक की बात होती है क्या राजनीति पर्शनल अखाड़े की जगह है या पब्लिक की परवरिश की, आज आस्तीन के साँपों ने पब्लिक को शिवाय जहर के अधिकार दिलाने की बात कही होती तो हमे अपने वोट देश और राजनीतिक पर गर्व होता लेकिन कुर्सी की खीचातानी मे स्वाभिमान सम्मान भी खूब दावपर लग रहे है,पर कोई परवाह नहीं क्यों कि हमतो अपनी अपनी बारी के इंतजार मे रहते है बदलते माहौल को बनाने के लिये नहीं, भूल जाते है हर पालिका का चेहरा इसी समाज के दर्पन मे संवरता भी हैऔर बिखरता भी है।