
#रब खैर करे—
#एटा-आजसे उन लोगों को और ऐलर्ट रहने की आवश्यकता है,जो कोरोना और उसके साईड इफेक्ट को समझते है।
क्यों कि आजसे जिन शहरों गांवों को कर्फ्यू मुक्त किया गया है वहां अधिक तर पब्लिक ऐसी है जो उल्टा सरकार पर ऐहसान करेगी सड़कों पर मौज मस्ती और रोजगार धंधे चलाकर रूलों की धज्जियां उड़ाकर अगर पहली लहर से पब्लिक ने कुछ सबक लिया होता तो कोरोना की दूसरी लहर ही नहीं आती सबसे बड़ी कमी हमारे अंदर है कि हर बात सरकारों के—-चाहे प्राकृतिक आपदा ही क्यों ना हो सर्मनाक पब्लिक तो पब्लिक है लेकिन वोटखौरों ने लासों पर भी सहयोग की बजाय घिनौनी राजनीति का परिचय दिया है अब पब्लिक अंधीबहरी गूगी है तो इसमे दोष किसका है,कभी अपोजिट की भूमिका पब्लिक हितमय हुआ करती थी टीवी चैनलों पर सत्ताधारियों से ज्यादा अपोजिट को सुनने के लिये समय पर टीवी खोलकर बैठ जाते थे,आज इन हथियारी जुवानों को सुनकर टीवी बंद करना पढता है,तब वही पुराने भोगे हुऔं को—–कटु सत्य है पर पब्लिक, और देश हितमय जरूर है,एकसे एक विद्वान और जनहित की सोच रखने बाले पड़े है समाज मे पर हर बार लौट फेरकर वही देश और पब्लिक को तबाह करने बाले राजनीतिक मोहरे—-जो धर्मों को बांटकर समाज की शक्ति और सौतेली घिनौनी राजनीति करते है,गरीब पब्लिक के अधिकारों की लूट करते है,काम बोलता है पर धूल झौंकने बाली राजनीति करते है पार्टियों की आस्तीन मे बैठे सांप पब्लिक और शहर का स्वार्थ की राजनीति से खून चूसते है राजनीति की परिभाषा कहां धर्मों की राजनीति सिखाती है फिर चाहे धर्म कोई भी क्यों ना कुर्सी पर बैठा हो कायदे की राजनीति तो वही होती है जो कुर्सी पर बैठने से पहले धर्म का खोल उतारकर रखदे तभी पब्लिक का हित हो सकता है,आज की राजनीति ने पब्लिक को असमंजस मे डालकर रख दिया है, तबकि वही समाज वही जाने पहचानने नेता—जो वोटके समय घौटू पड़ जाना फिर पब्लिक को ना पहचानने की गुरूरी आँखे यानी लौटफेर के पांच साल के बाद नये राजनीति का रिनूवल—और फिर धर्मों के हथियार और पब्लिक की गर्दन सत्य का खून हम कानून और आयोग से अनुरोध करते है कि अब बक्त आ गया है नये रूल बनाने का राजनीति को साफ चोला पहनाने का विद्वान और इंसान और भी है देश और पब्लिक हित के लिये।