कानूनी संहिताएं समीक्षित करनी होंगी
- शंकर देव तिवारी

अर्जुन पुरस्कार राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कारतथा पद्मश्री से सम्मानित एक देश के नागरिक के अपराधी पाए जाने से पहले एक घोषित अपराधी का व्यवहार हमारीं कानून व्यवस्था में दोयम दर्जे का होना नहीं प्रमाणित करता है । क्या उसके साथ एक जनप्रतिनिधि जैसा व्यवहार नहीं उचित था । माना ये कि हमारे देश के कानून की आंखों पर काली पट्टी बंधी है फिर ये दोहरे माप दंड क्यों । हमारे देश में ही ऐसे उदाहरण हैं जो आतंवादियों के लिए माफी अभियान चला शर्मशार नहीं होते व राजीव गाँधी जैसे व्यक्ति के हत्या में सजा याफ्ता को माफ करने वाली परम्परा डाली गई है तब के लिए कानून बनाने की नहीं सोची गई ।
जो कुछ है सब जनप्रतिनिधि के लिए ऐसा क्यों ? वह सजा से पहले जेल में विशेष श्रेणी में जेल में रहता ।सुनवाई विभिन्न आरामदायक परिस्थितियों में होती । सजा बुलने के बाद बीमारी केनाम पर राजनेतिक घोषित संविधानिक व्यक्ति राष्ट्रीय स्तर के दलों की कार्यकारिणियों की बेठक में भाग ले सकता है ।वह एक दिन का चुन कर भी पेंशन का हकदारी । दूसरी और 30 चालीस साल सेवा देकर भी पेंशन से वंचित सरकार चलाने के लिए मनचाही व्यव्यस्था के लिए नियम कानून बदल राजश्व प्रप्ति के लिए निजीकरण का दौर लाना मजे की बात तो तब जब एक बार फिर देश में ईस्ट इंडिया जैसे विदेशी संस्थानों को खुला आमंत्रण देना कोनसे जनहित की परंपरा का कायम करना उचित है ।
खेर ये बात आज की बात हमारे विषय से अलग है मगर जुड़ा हुआ है ।जब एक देश एक कानून का नारा लगा जीएसटी जैसी व्यवस्थाएं लागू करने की ओर अग्रसित मानते हैं तो जनप्रतिनिधि व अन्य संवेधानिक सम्मानित व्यक्ति को वे सुविधाएं क्यों नहीं । सम्मान प्रक्रिया में भी इन राजनीतिक कुचक्रियों ने षणयंत्र कर व्यव्यस्था दे रखी है । भारत रत्न जैसा सम्मान केवल नेताओं को ही आवंटित कर रखा है अन्य क्षेत्रों के लोगों को देते समय प्रधानमंत्री राष्ट्रपति तक की सहमति पर विशेष परिस्थिति में निर्णय राजनीतिक सोच के चलते क्रिकेट जैसे खेल पर तो लिया जा सकता है मगर सुभाष बोष और ध्यानचंद जैसे व्यक्तियों को आदिकाल से अनदेखा किया जाता रहा है ।
हमें किसी व्यक्ति विशेष के लिए कोई व्यवस्था देने के बजाए एक राय संविद होने का माहौल बनाना होगा । नहीं तो सुशील पहलवान जैसे ओलंपियन सम्मानित खिलाड़ियों की आदर्शवादिता कायम कैसे रख सकेंगे । हम किसी अपराध की सच्चाई जाने बिना उस आरोपी को सामाजिक तौर पर भेद भाव रखने का अधिकार नहीं रखते फिर ये हमारे देश में गैर राजनीतिक लोग के लिए क्यों ? हमें अपनी कानूनी संहिताएं समीक्षित करनी होंगी । तभी सही आदर्श कायम हो सकेंगे ।