
#यूपीएटा,
#मलेरियाटाईफाइडडेंगूसबकहांगये।
आज कोरोना की रोकथाम मे, बाकी स्वस्थ पब्लिक तो इन्हीं रोगों से कराह रही है,, पर आज देखने और भोगने मे इन सबसे खतरनाक है आजका आदमी देखने और भोगने मे सामने आ रहा है,नाइलाज तो कुछभी नहीं है,लेकिन आज आदमी इन संक्रमण रोगों से जान गंवाता चला जा रहा है और आदमी अपने-अपने स्वार्थ के धंधों मे लगा हुआ है,आज हम देख रहे है,सर्दी जुकाम, बुखार डेंगू, सब मर्जों को इग्नोर करके सिर्फ और सिर्फ करोना की मर्ज पर अटके हुये है,कोई बताएगा कि ये जो बाकी के रोग क्या खत्म हो गये जिनपर हमारे रक्षकों शुभचिंतकों का न कोई ध्यान है न कोई जिम्मेदारी का पालन हो रहा है नगरपालिका जो आज सफाई के नामपर सर्मनाक कार्य प्रणाली मे फोकस पर अपनी जिम्मेदारी से पूर्ण निष्क्रिय हो चुकी है, आज कमजोर बर्ग के इंसान को मच्छर जैसे खून चूसा से रातभर लड़ना पड़ता है इसकी रोकथाम के लिये किसी भी पालिका का कोई सहयोग नहीं हर पालिका आज उसी तरह एक ओर दौड़ रही है,कोरोना के पीछे जैसेकि शुरू मे बनसाइड के दहेज कानून का एजेंडा तैयार हुआ था आज इस एजेंडे का इतना अच्छा स्तेमाल हो रहा है कि अब किसी भी बेटी की नेचुरल मौत ही नहीं होती है रिजल्ट हमारे सामने हैकि आज निर्दोष परिवार अपमान और जेल की सलाखों के पीछे पड़े है,जिनपर दहेज तो क्या खुद परिवार चलाने की ब्यबस्था नहीं थी वह कन्या के दान पर रोजगार चला रहे है,हम ये भी नहीं कहते कि ये अपराध होही नहीं रहा है लेकिन दस परसेंट गुनाह की बजह से आज 90 निर्दोष अपमान और सजा काट रहे है बयार कभी एक रुख मय नहीं चलती है पर आदमी उसी के पीछे भागकर बिपरीत परिस्थितियों को अपनाने का आधी होता जा रहा है,तब कहना कहां गलत होगा कि आज आदमी से बड़ा कोई कोरोना सिद्ध नहीं हो रहा है,परिणाम से बेखबर होकर भायदा उठाने के आदतन आधी होते चले जा रहे है हम कारण आज जो समाज के आईने का मुंह पलटकर हमने रख दिया है,कभी हमारा घर परिवार सा लगता था ये,जो आज सबसे बड़ा दुष्मन बनता जा रहा है ताकतें बंटने लगी हमदर्दी का पलायन हो गया रिस्तों का खून होने लगा जबसे हम खुद और स्वार्थ मय जीने लगे है,आज बाकी देवता भी उपेक्षित है,क्यों कि लक्ष्मी का पूजन अब मात्र घरों और मंदिरों मे— तब चाहे कोई पालिका हो इस बुरे दौरमे भी अपने फर्ज से कोसों दूर महज औपचारिकता की भूमिका और पब्लिक के अधिकारों पर चाहे वोट हो या फर्ज, खुलकर लूट और दुर्पयोग करने मे लगे हुये साँसो पर धंधे रोगों पर अंधे,जबकि इस तरह की आपदाओं से हमे सबक की प्रेरणा लेनी चाहिये कि हम जो कर रहे और जुटा रहे है वह सबतो यहीं रह जाना है,खाली हाथ आने और जाने से हम सब परिचित हैं पर आदत की गुलामी हमे इंसान बनने ही नहीं देती है।