पीड़ित पत्रकारों को नही मिल रहा न्याय -चौथे स्तंभ का अस्तुत्य खतरे में
महोबा /उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद में पत्रकारों को अब न्यूज़ कवर करना महंगा पड़ रहा है अब पत्रकार न्यूज़ कवर करने से भयभीत होने लगे हैं पत्रकारों की सुरक्षा पर केंद्र सरकार राज्य सरकार व जिम्मेदार उच्च अफसर जरा भी ध्यान नही दे रहे है जिसके चलते आज मीडिया का अस्तुत्य खतरे में आ गया है ।सबसे अधिक विचारणीय बात तो यह है कि मामला की शिकायत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से की जा चुकी है व स्थानीय थाना स्तर पर भी शिकायत की गई किन्तु पीड़ित पत्रकार को आज तक न्याय नही मिल सका ।
घटना बीते दिनों की है जब पत्रकार भूपेंद्र कुमार व पत्रकार सुरेंद्र निराला गुप्त सूत्रों की सूचना पर कुलपहाड़ तहसील सी ओ आवास के पास पकड़ी गई अबैध शराव की कवरेज करने गए थे जिसको लेकर सीओ कुलपहाड़ की सह पर पुलिस ने पत्रकारों से अभद्रता व मारपीट की थी जिसकी शिकायत पीड़ित पत्रकारों ने मुख्य मंत्री को ऑनलाइन की थी किन्तु आज तक उन्हें न्याय नही मिल सका ।
पीड़ित पत्रकारों ने आरोप लगाया था कि पुलिस द्वारा अबैध शराव में कुछ सटरा चल रहा था और उसकी पोल खोलने के कारण ही उनके साथ ये घटना घटित हुई थी ।
फिलहाल कुछ भी हो कई दिन बीतने के वावजूद भी आज दौनों पीड़ित पत्रकार न्याय को तरस रहे हैं ।*पत्रकारिता के लिए बदनुमा धब्बा है कुलपहाड़ पुलिस*
उत्तर प्रदेश जिला महोबा फिर सुर्खियों में पुलिस की कार्यशैली संदेह के घेरे में✍
*महोबा*। निर्भीक निष्पक्ष पत्रकार और पत्रकारिता को जमींदोज कराने न का नाम है थाना कुलपहाड़ पुलिस-? बदतर चेहरा, भद्दे बोल और कानून के नंगे नाच का पाठ पढ़ाने का नाम है थाना -कुलपहाड़ पुलिस-? किसी की टोपी किसी के सिर रखने का नाम है कुलपहाड़ की खाकी बर्दी -? जी हां, आखिर ऐसा क्यों-? खेल खेल रही है, कुलपहाड़ की खाकी पुलिस -? संबैधानिक अधिकारो की धज्जियां उड़ाने बाली पुलिस का यदि कोई टारगेट का नाम है तो- पत्रकार और पत्रकारिता-? कानून को जीवित रखने के लिए पुलिस तंत्र व्यवस्था लागू की गई, और पुलिस को ऐसे अधिकार दिए गए जिसमें हर कानून के रखवाले का सम्मान हो और जो कानून तोड़ने की जहमत करें तो उन्हें कानून की जंजीरों से जकड़ कर सजा दिलाई जाये नकि दी जाये।। लेकिन महोबा जिले का एक थाना ऐसा है जहां यह लागू नहीं होता और उस थाने का नाम है कुलपहाड़ थाना-? अब आप ही देखिए जनपद महोबा के थाना कुलपहाड़ पुलिस को जिनके अधिकारी भी वहां के हर नाजायज काम का समर्थन करते है। यही है कि वहां की पुलिस कानून को खिलौना बनाकर खेल रही है और कानून की धज्जियां उड़ाने बाली पुलिस को रोकने की चेष्टा करने बाले लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकार और पत्रकारिता को पैरों तले रौंदा जा रहा है निष्पक्ष निर्भीक लेखनी को जमींदोज करने का नाम है बन चुकी है कुलपहाड़ पुलिस-?। जिसका जीता जागता उदाहरण है, वहां के पत्रकार सुरेंद्र कुमार निराला और भूपेंद्र कुमार के खिलाफ षंडयंत्र के तहत जो हुआ वो किसी से छिपा नहीं है। वहां की पुलिस ने अपना अपराध डकारने का किया नंगा खेल-? वहीं की पुलिस ने खुद के अपराध को छिपाने का नायाव दमनकारी नीतियों तरीका निकाला और शराब माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई की जगह एक पत्रकार की जिंदगी पर ही घिनैना खुला खेल डाला। यहां की खाकी का खेल ही कुछ ऐसा है, जहां अपना खेल बनाने के लिए एक निर्भीक निष्पक्ष पत्रकार की कलम को कानून का रूख बदल वली चढ़ा दी जाती है। कलम को मोडने का काम यहां की वेहिसाब खाकी निरंतर अपनी कारगुजारियां से करती आ रही है। यहां की पुलिस की धुंधली होती जा रही तस्वीर जन मानस के पटल पर आम हो गयी है। यहां आज पुलिस पत्रकार को दुश्मन समझने लगी है कारण पुलिस को हर पल समाज के सामने अपने कुरूप चेहरे को उजागर होने का डर बना रहता है और यही वजह है, कि पुलिस अब इन पत्रकारो को सबसे बड़ा कांटा समझने लगी है।