
#यूपीएटा,
कुर्सी बालों को कुर्सी मिलेगी मौत बालों को मौत पब्लिक हर रोज भरती है जुर्माना जान देकर हमारी लापरवाहियों का—
ये कुर्सियां पब्लिक के शवों पर रखी मिसाल होगी,
भूल जाएंगे बैठकर इनपर बैठने बाले,
ये शवों के ढेरों पर रखीं कुर्सियों की ऊंचाई को,लेकिन वह क्या भूलेंगे जिनके घरों के चिराग बुझ गये बच्चों से पिता मांग के सिंदूर, ममता की गोद उजड़ गई, हास्य प्रद योग्यता जमीन पर बैठी है,अपराध और पैसा कुर्सी पर फिर हम क्यों उस रामराज्य की कल्पना करते है,जहां पब्लिक हितके लिये रिस्ते दावपर लगे और खुशियां श्रापित हुई इतिहास गवाह है, अबतो राजनीति के बदलते सब्जेक्ट ने दिखा दिया कि इंसान की जिंदगी आज सबसे सस्ती है,नम्बर वन पैसा किसी शरीफ के पास होना मुमकिन नही है,इसी लिये वह राजनीति की पुरानी किताब को पढने से बंचित रह जाता है,उस लाइन तक कहां पहुच पाता है,जहां राजनीति की किताब बांटी जाती है,नोटों के बोरे भरकर लेजाओ और खरीद लो किसी भी गांव शहर जिला का चैन और अमन,देखते-देखते सत्य और सौहरत का कारवां इस तरह पलायन हुआ कि यदा कदा की आवाज इसतक पहुंची ही नहीं,
(मासूम कच्ची दीवारों पर टंगे आईना अब कहां दिखते,
दरख्तों के शवों पर सजे,येभी हकीकत से सर्माकर नजरे झुका लेते है,,)
पावरफुल समितियों का समय पर मूंक होना,
और तबाही पर जुवानी मरहम लगाना,जख्मों को कुरेदने बाले नस्तर से कई गुनाह दर्द देता है,अपोजिट की भूमिका कभी सरस्वती की जुवान और मानव अधिकारों की माई बाप होती थी,आज स्वार्थ मे डूबी विषधर जैसी भूमिका मे सामने आ रही है,धर्मों के हथियार आज शहीदों की आत्मा, और धरती के टुकड़े कर शक्ति का हलाल, और तिरंगे का अपमान करते है,देशका भविष्य युवा शराब और शबाब मे डूबा यदा,कदा को छोड़कर संसकारों से नंगा,हालात गवाह हैं कि भविष्य और भी दर्ददेय होगा,रिस्ते और मासूमियत मोबाइल मे शहीद हो गये,
किसको फुर्सत है जो झांके, हालात तबाही मे,
कस्तियां कौन लाएगा भरे तूफान मे लादकर चैनो अमन की,
यहां हर सक्स तन्हा है,समंदर भी है अब पूरे उफान मे,,
कहां मिलती हैं रोटियां,पढपढके पोथियां,
श्यमसान से सस्ता कहीं रोजगार नहीं है,,