
कौन सी सत्ता मे पैदा होगा इस शहर का बारिश—
एटा-बसों और अन्य बाहनों, वोट और इलेक्सन की रेलियों मे कोरोना नही चलता है,मात्र एटा की ट्रेन के शिवाय
एटा-शहर, पूंछने लगा है अपने सीने पै रैंगती मूंक बधिर पब्लिक से कि कितना और छीनोगे मेरे अधिकार सत्ता के रहनुमाओं से मिलकर जख्म सीने पर बजबजा रहे है चेहरा धुंध से पट गया बेनूर होती मुझ शहर की काया पर सितम और कितने बाकी है, (कौन सी सत्ता मे पैदा होगा इस शहर का बारिश) सर्द साँसों को गरम, और नंगे जिश्म पर आँचल डालेगा, आस बेआस होती जाती है जिसे भी देखो हाथ मे खंजर लिये आता है,सदियों की तलाश कब पूरी होगी बढती भीड़ का भार मुझ शहर की धढकन को दबाए जाता है, कराहने लगा है मेरे अंदर का धेर्य,मुद्दतों से मुलाकातें नहीं की अपने आईने से,
जवानी मे छिने नूर की,कहानी बताऊँ तो कैसे,,
वायदों ने चीर हरण,शिक्को ने हर बार लूटा है,
जुवानी ट्रेनों पर आता है,हरबार मेरे सजने का श्रंगार, हर पांच सालों के इंतजार से अबतो आँखें पथरा गई,विस्वास की जमीन बंजर होने लगी,
कर सको तो एक एहसान मुझ शहर पर करदो,
मेरे अधिकारों की बंजर जमीन पर अपने कामका हिसाब लिखदो,,