इन मासूम को बचाइए…..

इन मासूम को बचाइए…..
दोस्तों –याद है आप को ये बीर बहुटी?? बचपन में खेला करते थे हम ! मानसून की पहली रिमझिम बारिश की बूंदों के साथ लाल –लाल बीर बहुटी मखमल की तरह लगती । इन बीर बहुटी को हाथ लगाते ही ये अपने नन्हें पैर सिकोड़ कर बिलकुल लाल मोती की तरह हो जाती थीं । फिर हम बच्चे गाना गाते —-रानी कीड़ा रानी कीड़ा अपना दरवाज़ा खोल दो तुम्हारे लिए दूध भात लाए हैं —— और सच में वह पैर खोल कर चलने लगती थी । . आज जाने कहाँ से मेरी बगिया में एक बीर बहुटी आ गयी —–शायद अपनी जान बचाने ……क्योंकि कई किलोग्राम बीर बहुटी को एकत्रित कर के एक दवा बनाने की कम्पनी को भेजा जाता है ..जहां उन्हें सुखा कर तेल निकालते है …पुरुषों के पौरुषत्व के लिए ये दवा बनती है । अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय वियाग्रा की सर्वाधिक मांग है …ये दवा इन्ही नन्ही -नन्ही लाल मखमली प्यारी सी बीर बहुटी की जान लेके बनती है —पता नहीं क्यों पुरुष अपनी मर्दागनी जताने के लिए ,कमज़ोर ,मासूम , असहाय पर बल दिखा कर ही संतुष्ट होता है ? आज पृथ्वी दिवस पर यही विचार आता रहा , प्रकृति का संतुलन हम बिगाड़ रहे हैं । ईश्वर ने नभ ,जल ,थल में रहने का अधिकार सबको दिया है । फिर कभी विकास के लिए , कभी , वास्तु के नाम पर ,कभी शिकार के शौक़ के लिए ,कभी दवा के नाम पर पशु पक्षी की जान लेते हैं ।
जो इंसान एक बिल्ली के रास्ता काटने को अपशगुन मानता ,वह इन नाज़ुक ,मासूम बीर बहुटी को मारने में नहीं हिचकता ।
इसीलिए प्रकृति ने आज पूरे विश्व को एक ऐसा किटाणु ( वायरस) दिया है कि हाहाकार मचा है । और मानव उस से हार रहा है ।
न बिल्ली ,न कुत्ते का रोना , न उल्लू मनहूस है । बल्कि इन सब के लिए हम मनहूस हैं , अशुभ हैं , जो इनकी जान लेते हैं ।
पेड़ ही नहीं इन नन्हें जीव को भी बचाना है ।
आखिर कब तक इंसान अपने स्वार्थ के लिए मासूमों को मारता रहेगा ….????
—- डॉ निरुपमा वर्मा ….

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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