
विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस–15 मार्च …
उन दिनों जब स्कूल में थी एक कविता पढ़ी थी , शायद किसी अखबार या पत्रिका में- जो आज भी मुझे सार्थक लगती है । उसकी पंक्तियां इस प्रकार है —
व्यापारी धनिया में
घोड़े की लीद मिलाएंगे
वह दिन दूर नहीं
जब हम भी हिनहिनाएँगे …
हम हिनहिनाएँ या नहीं लेकिन समाचार पत्रों और चैनलों पर खाद्य पदार्थों में मिलावट की शिकायतें पढ़ने – सुनने को मिलती है । मिलावट के अतिरिक्त कम माप- तौल और डुप्लीकेट वस्तुएं की शिकायतें भी आम हैं । यह सभी बातें लोक नीति के विरुद्ध है यह सभी बातें उस सामाजिक न्याय के भी विरुद्ध जिसकी गारंटी संविधान हमें देता है। समाज के विरुद्ध किये जाने वाले ऐसे अपराधों से उपभोक्ता तभी लड़ सकता है जब उसे कानून की जानकारी हो ।
जब मैं जिला उपभोक्ता फोरम में न्यायिक सदस्य थी । तब एक परिवाद मेरे सामने आया था –गांव के किसी व्यक्ति ने किया था –शिकायत ये थी कि अपने बेटे की बरात के लिए उन्होंने एक रंग शाला जो बरात के साथ में नाचते गाते चलती है । वादी ने उस को एडवांस रुपये दिए थे । किन्तु बारात के दिन बैंड बाजा तो आया , वह रंग शाला की गाड़ी नहीं आई । परिवादी के अनुसार बैंड बाजे बालों के इस कृत्य से उनकी मूछें नीची हो गईं । .. इस वाद में सेवा की कमी मैंने पायी । एडवांस ले कर समय पर बारात मे शामिल न होना सेवा में कमी थी । अतः वादी को उचित मुआवजा दिलाया गया ।
..1)—उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम
यह महसूस किया गया कि उपभोक्ता की हर स्तर पर सुरक्षा की जानी चाहिए क्रेता को ही नहीं विक्रेता को भी सावधान रहना चाहिए किसी दूसरी से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया गया वस्तु या सेवा छुट्टी दहिया कमी रहित होनी चाहिए त्रुटि का अर्थ वस्तु या सेवा के क्वालिटी क्षमता शुद्धता मात्रा या मानक में कमी से है सेवा शब्द में जनजीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाली सेवाएं जैसे टेलीफोन बिजली पानी वेल यातायात आते हैं
2)–अपकृत्य विधि और उपभोक्ता संरक्षण —
अपकृत्य विधि एक असंहिता बद्ध सिविल विधि है । इस विधि का आधार सूत्र ” जहां विधिक अधिकारों की क्षति वहां उपचार है ” । जब दुकानदार की उचित सावधानी के अभाव में उपभोक्ता को हानि हो तो वह अपकृत्य विधि के अंतर्गत क्षतिपूर्ति का उपचार आ सकता है ।
3)—- वस्तु विक्रय अधिनियम 1930 और उपभोक्ता संरक्षण —
इस अधिनियम की धारा 17 में” क्रेता सावधान ” का सिद्धांत बताया गया है । इस नियम के अनुसार क्रेता को सावधानीपूर्वक माल की खरीद करनी चाहिए और स्वयं इस बात की जांच करनी चाहिए कि माल उस की आवश्यकता के अनुसार है या नहीं लेकिन यह सिद्धांत उन दशा में लागू नहीं होता जहां खरीददार ने पेटेंट या ट्रेडमार्क के अंतर्गत माल खरीदा हो या विक्रेता की कुशलता पर विश्वास किया और विक्रेता ने झूठ बोलकर या कपट से माल बेचा हो ।
4)—खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम 1954 एवं उपभोक्ता —
इस अधिनियम के अनुसार जब बेची गई वस्तु नियम द्वारा निर्धारित स्तर से कम पाई जाती है तो यह अनुमान होता है कि वह वस्तु अपमिश्रित या मिलावटी है अरब जिसका प्रभाव हानिकारक है । अस्वच्छ परिस्थिति में निर्मित वस्तु या सड़े गले पदार्थ कीट ग्रस्त पदार्थ भी अपमिश्रित माने गए हैं।
5)—भ्रामक विज्ञापन और उपभोक्ता संरक्षण –
उपभोक्ता संरक्षण कानून-2019 के अध्याय-7 में अपराध और दंड का प्रावधान है. इसमें कहा गया है कि कोई विनिर्माता या सेवा प्रदाता अगर झूठा या भ्रामक विज्ञापन देता है तो इसके लिए दो साल की सजा और 10 लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है. सजा का यह प्रावधान पहली बार भ्रामक और झूठा विज्ञापन का दोषी पाए जाने पर है. जबकि अगली बार भी दोषी पाए जाने पर पांच साल तक जेल की सजा और 50 लाख रुपये तक जुर्माना का प्रावधान है.
इस नये कानून के लागू होने पर फिल्म जगत के अभिनेता, अभिनेत्री समेत तमाम मशहूर हस्तियां किसी कंपनी के उत्पाद का विज्ञापन करने के लिए अनुबंध करने से पहले उत्पाद की गुणवत्ता को जरूर परखेंगे क्योंकि भ्रामक विज्ञापन देने पर उनकी भी जिम्मेदारी तय की जाएगी.
तो बस जागो ग्राहक जागो —
डॉ निरूपमा वर्मा (पूर्व सदस्य जिला उपभोक्ता फोरम –)