भारतीय वैज्ञानिक की बड़ी खोज, अब मीठे पानी में भी बनाए जा सकेंगे महंगे समुद्री मोती

भारतीय वैज्ञानिक की बड़ी खोज, अब मीठे पानी में भी बनाए जा सकेंगे महंगे समुद्री मोती

समुद्र के खारे पानी में बनने वाले महंगे मोतियों को अब तालाब, नदी के मीठे पानी में भी बनाया जा सकेगा. पर्ल एक्वाकल्चर वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार सोनकर द्वारा खोजी गई मोती उत्पादन की नई तकनीक से यह संभव हो पाया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की लखनऊ स्थित संस्था नेशनल ब्यूरो ऑफ फिश जेनेटिक रिर्सोसेज के निदेशक डॉ. कुलदीप के लाल ने इसे नई पड़ताल करार देते हुए कहा, यह पूरी दुनिया में मोती उत्पादन की प्रचलित पारंपरिक पद्धति में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली खोज है और इससे मोती उत्पादन के क्षेत्र में नये रास्ते खुलेंगे.

इस नयी खोज पर डॉ. सोनकर ने पीटीआई-भाषा को बताया क़ि समुद्री मोती में एरागोनाइट क्रिस्टलाइजेशन होता है, जिसकी वजह से उसमें चमकीले पदार्थ के अवयवों का पारस्परिक जोड़ मोती में चमकीले तत्व की मात्रा को बढ़ा देता है. मीठे पानी में एरागोनाइट क्रिस्टलाइजेशन बहुत मामूली होता है और वहां अधिक मात्रा में कैल्साइट क्रिस्टलाइजेशन होता है, जिसमें चमकीले पदार्थ की मात्रा भी 5 से 7 प्रतिशत ही होती है. इससे कुछ वर्षों में उसकी चमक गायब हो जाती है और इसी कारण से मीठे पानी का मोती सस्ता होता है, वहीं एरागोनाइट क्रिस्टलाइजेशन की वजह से समुद्री पानी के मोती की चमक सालों साल बनी रहती है और यह मीठे पानी के मोती के मुकाबले कई गुना महंगा होता है.

डॉ. सोनकर ने कहा, मोती के निर्माण में मेन्टल काफी अहम भूमिका निभाता है जो सीप के कठोर बाह्य शरीर के अन्दर का भाग है और इसी मेन्टल के स्राव के कारण मोती पर चमकीली परतें चढ़ती हैं. हमने जीन एक्सप्रेशन यानि जीन अभिव्यक्ति का इस्तेमाल कर सीप के एरागोनाइट क्रिस्टलाइजेशन करने वाले जीन को सक्रिय किया और सीप को नियंत्रित वातावरण में रखा. इसके जो परिणाम सामने आये हैं वह अद्वितीय हैं. अब मीठे पानी में हम मनचाहे रंग के मोती बनाने में सक्षम हैं.

About The Author

निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

Learn More →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अपडेट खबर के लिए इनेबल करें OK No thanks