समाज को आत्ममंथन करने की जरूरत..!

आज का समाज कल का इतिहास हो जाएगा तो क्या हम आने वाली पीढ़ियों को ऐसा घृणित हैवानियतों से भरा इतिहास देंगे?

समाज को आत्ममंथन करने की जरूरत..!

कई दिन पहले राष्ट्रीय बालिका दिवस हमारे द्वारा मनाया गया। यह दिवस सन 2008 से मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य बालिकाओं को समान अधिकार दिलाना है और शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण सहित अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर जागरूकता पैदा करना है। अफसोस यह है कि इसके उलट हो रही घटनाएं सारी उम्मीदों को तोड़ती हैं।
राष्ट्रीय बालिका दिवस के तीन दिन पहले महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले के भोकर तहसील के दिवसी गांव में पांच साल की बालिका हैवानियत की शिकार हो गई। दिल को दहलाने वाली ये घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं, बल्कि बढ़ती ही जा रही हैं। यह तब हो रहा है, जब हमारे पास पॉक्सो जैसा कठोर कानून है।
सवाल है कि क्या इसक मतलब यह है कि महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ इंसानियत को झकझोर देने वाली घटनाओं को अंजाम देने वाले हैवानों के मन में कानून का कोई भय नहीं रह गया है? अगर ऐसा नहीं है तो आखिरकार ये घटनाएं बढ़ क्यों रही हैं? समाज में ऐसी मानसिकता क्यों बढ़ रही है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?आज का समाज कल का इतिहास हो जाएगा तो क्या हम आने वाली पीढ़ियों को ऐसा घृणित हैवानियतों से भरा इतिहास देंगे? समाज को आत्ममंथन करने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के अनुसार विश्व भर में पंद्रह से बाइस आयु वर्ग की करीब डेढ़ करोड़ किशोर बालिकाएं अपने जीवन में कभी न कभी यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं।एक ओर हम नवरात्र में बालिका की पूजा करने का दिखावा करते हैं, लेकिन उस बालिका को सुरक्षित वातावरण देने का प्रयास हम कहां तक करते हैं! जब समाज में बालिकाएं सुरक्षित रहेंगी, तभी राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाना सार्थक होगा।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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