
पत्रकारों के दमन के लिए याद किया जायेगा योगी सरकार का कार्यकाल
यूं तो भारतीय जनता पार्टी की सरकार चाहे केन्द्र में बनी हो अथवा राज्यों में हमेशा लघु और मध्यम वर्गीय समाचार पत्रों और उनके पत्रकारों पर संकट के बादल छाये रहे हैं। केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार से पूर्व साप्ताहिक और मासिक पत्र/पत्रिकाओं को भी वर्ष में अनेकों विज्ञापन मिल जाते थे। तब सिर्फ 400 सेमी तक के विज्ञापन का कोई प्रतिबंध नहीं था। कभी-कभी पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन भी केन्द्र सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के माध्यम से जारी हुआ करते थे। लेकिन सुषमा स्वराज के सूचना और प्रसारण मंत्री बनते ही लघु और मध्यम वर्गीय समाचार पत्रों के विज्ञापनों पर संकट के बादल छाने शुरू हो गए। लघु और मध्यम वर्गीय समाचार पत्रों के विज्ञापनों पर कैंची चलनी शुरू हो गई। तब से लेकर आज तक लघु और मध्यम वर्गीय समाचार पत्रों और पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों का बुरा हाल है। उत्तर प्रदेश तो पिछले चार वर्षों से पत्रकारों का मुर्दाघर बन गया है। अपराधियों द्वारा अनेकों पत्रकारों की नृशंस हत्याएं कर दी गईं। वहीं उत्तर प्रदेश की पुलिस ने भी पत्रकारों को ही निशाने पर रखा। आश्चर्य तो इस बात का है कि जब-जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पत्रकारों को सुरक्षा और सम्मान देने की बात कही तब-तब पत्रकारों की हत्या होने और उन पर मुकदमे दर्ज होने की खबरें समाचार पत्रों में साथ-साथ ही छपीं। एटा जनपद में भी पत्रकारों पर मुकदमों की बौछार होने लगी है। यहां कुछ पत्रकारों पर समाचार संकलन को लेकर मुकदमे दर्ज किये गये जिनमें हिमांशु तिवारी और आमिर का प्रकरण प्रमुख है। खास बात तो यह है कि इसी मुकदमे में मौके पर न होते हुए भी प्रेस ट्रस्ट आॅफ इण्डिया (पीटीआई) के जिला सम्वाददाता सुनील मिश्रा का नाम भी शामिल कर लिया गया। इस प्रकरण को लेकर लगभग 4 माह से अधिक का समय हो गया है और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से लेकर आई0जी0 तक उन्हें यह आश्वासन दे चुके हैं कि आपके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी उसके बाद भी मुकदमे में यथास्थिति है। शायद पुलिस विभाग पत्रकारों पर मुकदमे की तलवार लटकाये रखकर उनकी कलम को कुंद करना चाहती है। इस जनपद के कुछ युवा और उत्साही पत्रकार समाचार संकलन करते समय पुलिस कार्रवाई की जद में आकर मुकदमों की मार झेल रहे हैं। पत्रकारिता के लिए समाचार संकलन करना भी एक मर्यादित आचरण है। समाचार संकलन करने के लिए हम किसी की भी निजता का हनन नहीं कर सकते। यह बात पत्रकारों को ध्यान में रखनी ही होगी। हमारी पत्रकारिता किसी को स्वयं दंड देने के लिए नहीं होनी चाहिए। हमें निष्पक्ष और दुर्भाव रहित समाचार प्रकाशित करना चाहिए कार्रवाई करने का काम पुलिस और प्रशासन का है। पत्रकारों को कोई अलग से अधिकार प्राप्त नहीं हैं जो अधिकार आम आदमी को प्राप्त हैं उन्हीं अधिकारों के तहत पत्रकारों को भी समाचार संकलन करने का सहज और सुलभ रास्ता तलाशना पड़ता है। खेद का विषय है कि बिना किसी सुरक्षा के जनता की सेवा करने और भ्रष्टाचार को उजागर करने निकले पत्रकारों पर जहां उत्तर प्रदेश सरकार झूठा सम्मान देने और उनकी सुरक्षा करने का वादा और बयानबाजी करती है वहीं उसका पुलिस प्रशासन पत्रकारों की लेखनी को भ्रष्टाचार पर चलने से रोकने को पूरी तरह आमादा है। यह तो सभी जानते हैं कि राजनीति में जो कुछ कहा जाता है वह नहीं होता अथवा नहीं किया जाता। क्या उत्तर प्रदेश सरकार भी पत्रकारों को सम्मान और सुरक्षा देने का झूठा झुनझुना पकड़ा रही है? पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान की बात करते-करते गाजियाबाद, कानपुर और उन्नाव में पत्रकारों की नृशंस हत्यायें हुईं। हमलों और पुलिस कार्रवाई पीड़ित पत्रकारों की गिनती पूरे उत्तर प्रदेश में एक सैकड़ा को छू सकती है। उत्तर प्रदेश में राजनीतिक लोगों, पुलिस, अपराधी और माफियाओं के गठजोड़ हो चुके हैं जिनकी खबरें छापना पत्रकारों के लिए जान जोखिम में डालना और मुकदमों में फंसना बन गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ मुकदमा छापने पर पुलिस और नेताओं के गठजोड़ के कारण कई पत्रकार बीस-बीस वर्षों से मुकदमे झेल रहे हैं और उन मुकदमों में वादी पक्ष उपस्थित नहीं होता लेकिन अदालती कार्रवाई के रूप में सिर्फ तारीखें मिलती रहती हैं। उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि जिस प्रकार विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के मुकदमे उनके दल की सरकार बनने पर वापस ले लिए जाते हैं उसी प्रकार उत्तर प्रदेश के पत्रकारों पर दर्ज सभी मुकदमे एक साथ वापस लेकर उन्हें सम्मान और सुरक्षा प्रदान करे।