जनता ने विधायक चुना और विधायक ने बना दिया प्रतिनिधि*
झांसी। लोकतंत्र में जनादेश जनता देती है। जनता ही अपने वोट के माध्यम से आदेश देती है कि कौन उनका प्रतिनिधि बनकर विधानसभा में जाएगा। जनता ही आदेश देती है कि कौन उनका प्रतिनिधि बनकर लोकसभा में जाएगा। जनता के आदेश को इसीलिए जनादेश कहा जाता है। जनता जिसे प्रतिनिधि बनाती है उसे ही जनप्रतिनिधि कहा जाता है। जनप्रतिनिधि के नाम के साथ माननीय ऐसे ही नहीं लग जाता है। जनप्रतिनिधि क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधि होता है।
माना जाता है कि उसे जनता ने चुनकर अपने प्रतिनिधि के रूप में भेजा है इसलिए वह माननीय प्रतिनिधि होता है। लेकिन यदि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि भी अपना प्रतिनिधि रखने लगे और प्रतिनिधि की भाषा कहीं दरबारी तो कहीं स्वयं में जनप्रतिनिधि की हो जाए तो फिर इस स्थिति को लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं माना जाता। लोनी में चर्चा इसी बात को लेकर है। *झांसी जनपद* के लोग पूछ रहे हैं कि हमने वोट के जरिए जनप्रतिनिधि चुना है या उनके द्वारा किसी भी व्यक्ति को प्रतिनिधि घोषित कर दिए गए व्यक्ति को। जनता के बीच ही चर्चा है कि यदि विधायक के पास इतना काम है कि वह अपने क्षेत्र में भी प्रतिनिधि नियुक्त कर रहे हैं तो फिर देश के पीएम और सूबे के सीएम के पास तो उनसे भी ज्यादा काम है। फिर प्रधानमंत्री का प्रतिनिधि और मुख्यमंत्री का प्रतिनिधि क्यों नहीं नियुक्त हो रहा। उन्हें भी अपने प्रतिनिधि रख लेने चाहिए। कार्यक्रमों में प्रतिनिधि जाने लगे, बैठकों में प्रतिनिधि भी कुर्सी पर बैठ जाए, क्योंकि जैसे विधायक हर जगह नहीं पहुंच पाते, ऐसे ही पीएम और सीएम भी हर जगह नहीं पहुंच पाते। इसलिए प्रतिनिधि तो अब मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का भी होना चाहिए। चर्चा जनता के बीच भी है और भाजपा के बीच भी। सवाल यह खड़ा हुआ है कि आखिर जनप्रतिनिधियों द्वारा बनाए जाने वाले इन प्रतिनिधियों का संवैधानिक स्टेटस क्या है। क्या प्रशासनिक अधिकारियों को जनप्रतिनिधि के द्वारा स्वयं किसी भी व्यक्ति को प्रतिनिधि घोषित करने के बाद प्रशासनिक प्रोटोकॉल के तहत उसकी सिफारिश माननी चाहिए। यदि वह किसी अधिकारी से मिलने गया है तो प्रशासनिक प्रोटोकॉल के तहत क्या ऐसे प्रतिनिधि को कुर्सी आॅफर की जाएगी। क्योंकि प्रतिनिधि न चुनाव लड़ा और न चुनाव जीता। जनता ने जनादेश भी जनप्रतिनिधि को दिया है न कि उसके प्रतिनिधि को। जनप्रतिनिधि का पीए किसी एप्लीकेशन को ले ले तो बात समझ में भी आती है लेकिन खुद को जनप्रतिनिधि का प्रतिनिधि बताकर आखिर कौन लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहा है।
मजाक प्रतिनिधि खुद उड़ा रहा है या जनप्रतिनिधि उससे जनादेश का मजाक उड़वा रहे हैं। कभी साहिबाबाद विधायक सुनील शर्मा ने भी गाजियाबाद से विधायक रहते हुए 60 से अधिक प्रतिनिधि बनाए थे। लेकिन जब वह दूसरी बार विधायक बने तो उन्होंने यह गलती दोहराई नहीं है। गाजियाबाद में भी कई प्रतिनिधि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से काम कर रहे हैं। अब सवाल सियासी गलियारों में भी है कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को क्या अपना प्रतिनिधि नियुक्त करने का अधिकार है। कल तो प्रशासनिक अधिकारी भी किसी भी व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि बना देंगे। वैसे भी जिसे जनता ने जनप्रतिनिधि बनाया है, वह कम से कम जनादेश का तो सम्मान करें।