
अमरशहीद महावीर सिंह राठौर का जन्म 16 सितम्बर 1904 को एटा जनपद के शाहपुर टहला में कुंवर देवीसिंह राजवैध के यहां हुआ था। ये 1927 में लाहौर गये। वहां लाहौर षड्यंत्र केस में भाग लेने के कारण 1929 में अपने घर से गिरफ्तार हुए। 7 अक्टूबर 1930 को आजन्म कारावास की सजा मिलने पर पहले मुल्तान सेन्ट्रल जेल में रखे गये। फिर 1931 में मद्रास जेल भेजे गये। 1933 में इन्हें अण्दमान की सेलूलर जेल (कालापानी) भेजा गया। यहां 15 मई 1933 को जेल की नारकीय यन्त्रणाओं के विरूद्ध आमरण अनशन किया। इस अनशन के दौरान 17 मई 1933 को जेल अधिकारियों के आदेश पर 10-12 पठान कैदियों द्वारा जबरन पटककर दूध पिलाए जाने का प्रयास करने पर पेट में डाली गयी नली पेट में न जाकर फेंफड़ों में पहुंच गयी। इसके माध्यम से एक सेर दूध फेंफड़ों में पहुंच जाने से इनकी मृत्यु हुई।
यह षड्यंत्र सितम्बर 1928 में अपने पूरे रूप में उभरकर सामने आया। वैसे इसकी शुरूआत पहले ही छोटे-छोटे षड्यंत्रों से हो चुकी थी। इनका विस्तार पंजाब, बिहार व कलकत्ता तक था। ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ के सेन्ट्रल ट्रायल सं. 9/1929 (राज्य बनाम भगतसिंह एवं बटुकेश्वर दत्त आदि) एवं इसके लिए अध्यादेश संख्या ।।। वर्ष 1930 के अंतर्गत गठित किये गये ‘लाहौर ट्रिब्यूनल’ में इस मुकदमे में कुल 24 आरोपित थे। इनमें क्रमांक 19 के आरोपित भगवानदास को ट्रायल के लिए नहीं भेजा गया। जबकि सं. 20 के आरोपित चंद्रशेखर आजाद, 21 के कालीचरन उर्फ कैलाशपति, 22 के भगवतीचरण बोहरा, 23 के यशपाल व 24 के सतगुरदयाल फरार घोषित किये गये। शेष रहे 18 अभियुक्तों में क्र. 2 पर अंकित आज्ञाराम उर्फ मास्टरजी, 6 पर अंकित सुरिन्द्रनाथ पांडे उर्फ स्टोन 10 जुलाई 1930 को ट्रिब्यूनल के आदेश पर धारा 393 के तहत छोडे गये। इसी दिन तीसरा आरोपित भक्तेश्वर दत्त उर्फ बट्टू उर्फ मोहन को भी इसी दिन धारा 494 के तहत छोड़ा गया। मामले के मुख्य आरोपितों में क्र. 1 पर अंकित सुखदेव उर्फ दयाल उर्फ स्वामी उर्फ विलेजर, 7 पर अंकित जयदेव उर्फ हरीशचंद्र, 10 पर अंकित महावीरसिंह (राठौर) उर्फ प्रताप, 11 पर अंकित भगतसिंह, 16 पर अंकित शिवराम राजगुरू उर्फ एम ही प्रमुख थे।