15 अगस्त

जन्म : 15 अगस्त 1872
मृत्यु : 05 दिसंबर 1950
महर्षि अरविंद घोष, जिन्हें देश योगी अरविंद के नाम से भी जानती है, वह सशस्त्र क्रांति की प्रेरणा भी माने जाते हैं।
उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में हुआ। आपको यह जानकर हैरानी होगी, कि अरविंद के पिता अंग्रेज़ों के प्रशंसक हुआ करते थे।
तभी तो उन्होंने, हमेशा अपने बेटे को भारत के स्वाधीनता संग्राम से दूर रखने की कोशिश की थी। लेकिन भवितव्य को कोई नहीं टाल सकता। विदेश में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, जब अरविंद भारत लौटे, तो उन्होंने सरकारी नौकरी के मुकाबले, देश की स्वतंत्रता को ज़्यादा महत्व दिया।
साल 1902 के कांग्रेस सत्र में उनकी मुलाकात, बाल गंगाधर तिलक से हुई और इस एक मुलाकात ने, उनके जीवन की दिशा बदल कर रख दी।
लोकमान्य तिलक के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर, अरविंद घोष स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जुड़ गए और गरम-दल का हिस्सा बने। इसके कुछ समय पश्चात, श्री अरविंद ने ‘वंदे मातरम’ नाम की एक पत्रिका का संपादन भी किया, जिसने कई युवाओं को देश की स्वतंत्रता के साथ परिचित करवाने का कार्य किया।
योग के साथ श्री अरविंद का रिश्ता तब जुड़ा, जब अपनी नौकरी के प्राथमिक दिनों में वह बड़ौदा में रहा करते थे।
उस दौरान एक योगी महात्मा के संस्पर्श में आकर ही, उन्होंने योगाभ्यास की शुरुआत की थी। जब श्री अरविंद को अलीपुर बम कांड में दोषी पाते हुए, कारावास की सज़ा सुनाई गई, तब वहाँ रहते हुए भी अरविंद का मन, सदा आध्यात्म में डूबा रहा। उस दौरान, उनमें आध्यात्मिक अनुभूतियों का संचारण इस प्रकार हुआ, कि साल 1910 में कारावास का अंत होते ही, वह पुदुचेरी जो तत्कालीन पॉन्डिचेरी थी, वहाँ चले गए।
वहां जाकर उन्होंने, राजनीति से संन्यास लेकर, अपना जीवन आध्यात्मिकता को समर्पित करते हुए, एक आश्रम की स्थापना की।
मानवता के कल्याण के लिए, श्री अरविंद हमेशा अखंडित भारतवर्ष का स्वप्न देखा करते थे। जब 1947 में देश को आज़ादी मिली, तब उन्होंने रेडियो माध्यम से देशवासियों तक अपना संदेश पहुंचाया था।
इतना ही नहीं, अपने शरीर और मन, दोनों की उन्नति हेतु उन्होंने आजीवन, सभी को योग में लिप्त रहने की बात कही। उनका मानना था, जब मनुष्य अपने आपको अपने अंतर्मन से जोड़ लेता है, तो वही सच्ची उपासना होती है। 5 दिसंबर, 1950 को इस महान व्यक्तित्व ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
कहा जाता है, कि उनकी मृत्यु के पश्चात भी चार दिनों तक, उनके शरीर में एक अद्भुत आभा का संचरण हो रहा था।
इसलिए उनके अनुरागियों ने, उनके शरीर को दाह ना करते हुए, उन्हें दफनाने का निश्चय किया। 9 दिसंबर को, उन्हें उनके आश्रम में मिट्टी के सुपुर्द कर दिया गया।
भारत माता के तेजस्वी पुत्र, श्री अरविंद घोष के जन्म के उपलक्ष्य में स्वतंत्रता दिवस के ही दिन, उनकी जयंती मनाई जाती है।
उनकी जन्म जयंती, स्वतंत्रता की इस तिथि को और भी शोभनीय बना देती है। हर वर्ष इस दिन, वीरता और प्रतिभा के इस सदा-प्रज्ज्वलित दीपक को याद करते हुए, उनके बारे में चर्चा कर, यह दिन व्यतीत किया जाता है। खासकर पश्चिम बंगाल में तो उनकी जयंती, बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। ऐसे महान व्यक्तित्व को हमारा, शत-शत नमन है।