मसान की गोद में एक ज़िंदा थकान

बनारस के मणिकर्णिका घाट पर जहाँ चिताएँ जलती हैं, वहीं किसी ने चिता की सेज पर गद्दा बिछाकर नींद ओढ़ ली है। यह दृश्य किसी लाचारी की कहानी नहीं, बल्कि उस शहर का ऐलान है जो मृत्यु को भी मस्ती से जीता है।
वह लोहे का चूल्हा, जिस पर देह की अंतिम आहुति दी जाती है – आज किसी बनारसी फक्कड़ की शैय्या बन गया है। न डर, न चिंता – बस नींद है और वह भी मसान की गोद में।
यह आदमी कोई भिखारी नहीं – यह वही बनारसी आत्मा है जो कहती है- “जब ज़िंदगी थका दे, तो मसान ही सबसे आरामगाह है।”
न उसे मोक्ष की जल्दी है, न मोह की उलझन – वह बस जीता है अपने ढंग से, अपने अंदाज़ में।
यह तस्वीर बनारस के उस दर्शन की है जहाँ मौत भी एक उत्सव है और श्मशान भी विश्रामस्थली। यहाँ जिंदगी हँसती है, मौत मुस्कुराती है और चिता पर भी चैन की नींद आ जाती है।
क्योंकि – इ हव रजा बनारस… आउर बनारस में कुच्छो असंभव नाहीं हौ।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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