
भार्गव अस्त्र क्या था इसका निर्माण किसने किया था। क्या महाभारत युद्ध में इस अस्त्र का प्रयोग किया गया था और किसने किया और किस पर?
कुरुक्षेत्र युद्ध के सत्रवहें दिन कर्ण के सेनापतित्व में कौरव सेना पांडवों से युद्ध कर रही थी। इसी दिन कर्ण ने दो बार भार्गवास्त्र का प्रयोग अर्जुन पर किया था। यह एक किस्म का दिव्यास्त्र था जो स्वयं उनके गुरु परशुराम जी ने उन्हें दिया था।
सबसे पहले कर्ण ने उस दिन युधिष्ठिर को उनकी सेना सहित बहुत बुरी तरह पराजित करके रणभूमि से भगा दिया था। इसके बाद वो पांचाल सेना का संहार करने लगे। उधर पांडव सेना भी कौरवों का संहार कर रही थी। यह देखकर दुर्योधन कर्ण के पास गया और उनसे कुछ करने को कहा।
अपने मित्र की बात सुनकर कर्ण ने परशुराम जी का दिया हुआ विजय धनुष निकाल लिया और उन्होंने भार्गवास्त्र का आवाह्न किया। इस अस्त्र के प्रभाव से करोड़ों बाण और शस्त्र समरभूमी में प्रकट हुए और समस्त पांडव सेना का वध करने लगे। समस्त भूमि पांडव सैनिकों के शवों से पट गई थी।
इस भयंकर अस्त्र के प्रभाव को देखकर पांडव सेना हतप्रभ हो गई थी। चारों ओर हाहाकार मच गया था। हर एक पांडव सैनिक अर्जुन को पुकार रहा था।
अर्जुन ने खुद श्री कृष्ण से कबूला की वो इस अस्त्र को किसी भी उपाय से नष्ट नहीं कर सकते थे। श्री कृष्ण ने परिस्थिति का विश्लेषण करते हुए अर्जुन के रथ को रणभूमि से दूर युधिष्ठिर के शिविर में लेकर चले गए। ऐसा उन्होंने कर्ण को थकाने के लिए किया था ताकि जब अर्जुन अपने बड़े भाई से मिलकर वापस लौटें, तब वह कर्ण का वध आसानी से कर सकें।
दूसरी बार कर्ण ने इस अस्त्र का प्रयोग अर्जुन के साथ अपने अंतिम युद्ध में किया था। इस युद्ध में दोनों योद्धा एक दूसरे के ऊपर दिव्यास्त्रों की बौछार कर रहे थे।
इसी दौरान अर्जुन ने कर्ण पर वज्रास्त्र का प्रयोग किया। इसके प्रभाव से समरभूमी में हजारों अस्त्र छूटने लगे जो कर्ण को जा लगे। इसके प्रतिकार में कर्ण ने भार्गवास्त्र का आवाह्न किया।
कर्ण के इस अस्त्र ने अर्जुन के वज्रास्त्र के टुकड़े – टुकड़े कर दिए। इसके अतिरिक्त इस अस्त्र के प्रभाव से पांडव पक्ष के हज़ारों सैनिकों और रथियों का भी वध हो गया था।
कर्ण ने भार्गवास्त्र का प्रयोग तीसरी बार अपने मृत्यु से पहले करना चाहा जब वह विरथ होकर अर्जुन से युद्ध कर रहे थे। लेकिन परशुराम जी के शाप के कारण यह अस्त्र उनके मन से उतर गया था।