
उज्जैन, महाकाल की नगरी, जहां लाखों करोड़ों लोग प्रभु के प्रति अपनी आस्था और प्रेम से दर्शन को आते हैं ,
वहीं वर्तमान में उत्तराखण्ड से कुछ श्रद्धालु गण अपने परिवार सहित बिटिया और दामाद भी बड़े उत्साह से दर्शनार्थ गए थे।
श्रद्धालु गण ये सोचकर परेशान थे कि जिस नदी में श्रद्धा सुमन चढ़ते हैं उसमें बदबू आ रही थी।
ये कैसा यहां के मन्दिर प्रशाशन कमेटी व स्थानीय सरकार की कार्यप्रणाली हैं जो ऐसी पवित्र स्थान में लोग गंदे कपड़े धोते हैं, कुछ लोग तो गंदे कपड़े वहीं छोड़ देते हैं। बिस्कुट और नमकीन के पैकेट इस बात की तस्दीक करते हैं
और वहां स्वक्षता को मैनेज करने के लिए कोई गाइडलाइंस नहीं बनाई गई है और यदि बनाई गई है तो उसको कड़ाई से पालन नहीं कराया जा रहा है। पता नहीं गन्दगी फैलाने वाले श्रद्धालुओं की मानसिकता क्या है। क्यों इसे पवित्र स्थानों पर ऐसे गन्दगी फैलाने है।
लगता है प्रशासन का तीर्थ स्थानों और धर्मस्थलों के रखरखाव और स्वछता से कोई सरोकार नहीं।
ये बात लाज़िम है कि अगर किसी तीर्थ स्थल से अधिक आय अर्जित होने लग जाए तो सरकार का ध्यान फौरन उस तरफ आकर्षित होने लगता है।
इन सब हालातों को देखकर श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं और सरकार की इच्छाशक्ति पर सवाल उठता है कि आखिर कौन करेगा ऐसे धार्मिक स्थलों की देखरेख।
क्या स्थानीय सरकार मन्दिरों से टैक्स लेने के लिए ही है,???
या श्रद्धालुओं के आस्था व विश्वास को कायम रखने के लिए आवश्यक कार्यवाही करते हुए स्वक्षता को भी कायम रखने की आवश्यकता है
अतः श्रद्धालुओं के भावनाओं को देखते हुए उज्जैन के महाकाल मन्दिर प्रशाशन और स्थानीय सरकार से विनम्र निवेदन है कि शिप्रा नदी के घाट पर स्वक्षता को बनाए रखने का कष्ट करें।कृष्ण माधव मिश्रा ब्यूरो चीफ