
वट सावित्री व्रत के अवसर पर सुहागिन महिलाओं ने किया वट वृक्ष की पूजा अर्चना बट वृक्ष (बरगद के पेड़ ) में धागा सूत लपेट कर पति की दृधायु की कामना की।
धनबाद, सिंदरी।
जेठ महीने की अमावस्या तिथि पर सोमवार को वट सावित्री व्रत के अवसर पर सुहागिन महिलाओं ने श्रद्धा और उल्लास पूर्वक बट वृक्ष बरगद के पेड़ के नीचे पूजा अर्चना की। सुहागिन महिलाओं ने सज धज कर वट वृक्ष (बरगद पेड़) की पूजा कर अपने पति की दीर्घायु की कामना की। सुबह से महिलाओं को वट वृक्ष के समीप काफी भीड़ पूजा अर्चना करते देखा गया । महिलाओं के माथे पर चुनरी, मांग में सिंदूर, हाथों में पूजा की थाली और बालों में बरगद की पत्तियाँ लगाए सनातन धर्म को निर्वाह करते हुए श्रद्धा भाव के साथ पूजा अर्चना करते देखा गया।
वट सावित्री व्रत भारतीय स्त्री परंपरा में पति के दिर्घायु के लिए माना जाता है। पुराणों के अनुसार, इसी दिन सावित्री ने यमराज से अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस लिए थे। तभी से यह पर्व पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख की प्राप्ति हेतु महिलाओं द्वारा किया जाता है। झारखंड में यह परंपरा न सिर्फ जीवित है, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसे सहेजकर निभाया जाता रहा है।
कई गांवों और शहरों में सामूहिक रूप से वट वृक्ष के चारों ओर रंगोली सजाई गई और पूजा मंच तैयार किए गए। महिलाएं क्रमशः पीली और लाल साड़ी पहनकर, बिंदी, चूड़ी और आलता के साथ नई नवेली दुल्हन की तरह सजीं धजी । उन्होंने सामूहिक रूप से ‘सावित्री व्रत कथा’ का श्रवण किया और उसके बाद वट वृक्ष की सात परिक्रमाएं कर पूजा अर्चना की। महिलाओं ने बताया कि “यह केवल पूजा नहीं, विश्वास और श्रद्धा है। हमारी दादी-नानी इसे करती थीं, अब हम और हमारी बेटियां भी इस परंपरा को निभा रही हैं।”
शहरों में मंदिर परिसर और सड़कों के किनारे लगे वट वृक्षों पर श्रद्धालुओं की लगी भीड़।
धनबाद जिला के सिंदरी शहरपुरा शिव मंदिर, रांगा माटी, रोड़ा बांध, मनोहर टांड़,बी आई टी सिंदरी, गौशाला, कांड्रा,पाथरडीह,डीगवाडीह, झरिया, धनबाद के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने वट सावित्री व्रत का पूजा अर्चना किया ।
व्रतियों ने एक-दूसरे को कुमकुम, चूड़ी और मिठाई देकर सौभाग्यवती का आशीर्वाद दिया। खासकर युवा वधुओं ने अपने जूड़े में वट के पत्तों को फूलों के साथ सजा रखा था। इसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
पूजा की विधि में निखरी परंपरा की पवित्रता।
महिलाओं ने पूजा के लिए विशेष रूप से मिट्टी के बर्तन, सात प्रकार के अनाज, जल कलश, लाल कपड़ा, मौली, रोली, अक्षत, फल-फूल और व्रत कथा पुस्तिका की व्यवस्था की थी। बरगद की जड़ों में जल अर्पित कर, लाल धागा लपेटते हुए महिलाएं पूरी श्रद्धा से ‘वट सावित्री व्रत कथा’ सुनी ।
और दिन भर निर्जला व्रत रखते हुए। दोपहर में पूजा के बाद ही फलाहार ग्रहण करती हैं ।
इस अवसर पर कई बुजुर्ग महिलाओं ने अपनी बहुओं और बेटियों को पूजा की विधि सिखाई और सावित्री-सत्यवान की कथा विस्तार से सुनाई। यह दृश्य सामाजिक और पारिवारिक एकता का सुंदर चित्र प्रस्तुत कर रहा था।
जहां एक ओर यह पर्व परंपरा से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर यह महिलाओं की एकजुटता, सामूहिकता और सांस्कृतिक नेतृत्व को दर्शाता है। कई स्थानों पर महिलाओं ने स्वयं कथावाचन किया, आयोजन की पूरी व्यवस्था संभाली और नवविवाहित वधुओं को परंपरा से जोड़ा।
बताते हैं, “वट सावित्री व्रत एक धार्मिक अनुष्ठान से अधिक एक सामाजिक समरसता का पर्व है। यह महिलाओं की सांस्कृतिक चेतना, पारिवारिक दायित्व और आस्था के संयोजन का उदाहरण है। यह परंपरा उन्हें भावनात्मक शक्ति और सामाजिक सहभागिता दोनों प्रदान करती है।”
वट वृक्ष को आयुर्वेद में दीर्घजीविता, शुद्धता और ऊर्जा का स्रोत माना गया है। इसकी छाया, हवा और जड़ें प्राकृतिक रूप से स्वास्थ्यवर्धक मानी जाती हैं। सावित्री की कथा में यमराज से संघर्ष, साहस और दृढ़ संकल्प जैसी नैतिक शिक्षाएँ छुपी हैं जो हर महिला को प्रेरित करती हैं।
दिन भर चले पूजन-अर्चन और कथावाचन के बाद महिलाएं अपने घरों को लौटीं, जहां व्रत खोलने की प्रक्रिया की गई। कई घरों में विशेष पकवान बनाए गए और पूरे परिवार ने इस पर्व की अनुभूति साझा की।
श्रद्धा और संस्कृति का संगम
वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय नारी की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है। इस पर्व ने यह साबित करता है कि हमारी परंपराएं आज भी जीवित हैं, सजग हैं और समाज को सनातन धर्म को जीवित रखा है। आधुनिक जीवनशैली में रची-बसी महिलाएं भी अपनी जड़ों से जुड़ी हैं, और यह पर्व परंपरा से चली आ रही यादों को याद दिलाती है।