
श्लोक 4 (भागवत गीता 9.4):
“मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥”
श्लोक 5 (भागवत गीता 9.5):
“न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥”
भावार्थ:
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत मेरी अव्यक्त शक्ति (जिसे माया या ब्रह्म कहा जाता है) से व्याप्त है। सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। यह उनकी दिव्य योगमाया का चमत्कार है कि वे सभी प्राणियों का आधार हैं, फिर भी किसी एक में सीमित नहीं होते। वे सर्वत्र हैं लेकिन किसी में बंधे हुए नहीं।
जब कोई साधक सत्य की खोज करता है, तो वह यह अनुभव करता है कि यह संसार केवल बाह्य रूप से वास्तविक प्रतीत होता है, परंतु उसकी वास्तविकता की जड़ ईश्वर में निहित है। जैसे सपने में दिखने वाली हर वस्तु केवल स्वप्न देखने वाले के मन से ही उत्पन्न होती है — उसी प्रकार यह सारा संसार ईश्वर की चेतना से प्रकट हुआ है। लेकिन जैसे सपना देखने वाला स्वयं सपने में सीमित नहीं होता, वैसे ही परमात्मा इस संसार में होते हुए भी उसमें सीमित नहीं है।
जब मन में सत्य की जिज्ञासा उत्पन्न होती है:
साधक के मन में जब आत्मबोध की प्यास जागती है — “मैं कौन हूँ?”, “यह संसार क्या है?”, “ईश्वर कहाँ है?” — तब उसे बाहरी भौतिक वस्तुएँ अर्थहीन लगने लगती हैं। क्योंकि तब वह जानना चाहता है उस सत्य को जो सदा है, जो बदलता नहीं है, जो जन्म-मरण से परे है। यही वह बिंदु होता है जहाँ वैराग्य का जन्म होता है — और ज्ञान की ओर यात्रा प्रारंभ होती है।
ईश्वर सर्वत्र हैं, सभी प्राणियों में, सभी वस्तुओं में, परंतु वे किसी एक रूप, नाम, या स्थिति में बंधे नहीं हैं। जब आत्मा इस बात को जानने के लिए बेचैन हो उठती है, तो यह संसार उसे एक अस्थायी अनुभव लगने लगता है — और वह सत्य की खोज में ईश्वर की ओर मुड़ता है।