22 अप्रैल, पृथ्वी दिवस पर विशेष

आज धरती विनाश के मुहाने पर है। इसका सबसे बड़ा कारण धरती के आंतरिक कोर का आकार तेजी से बदलना है। इसमें मानवीय कारगुजारियों के चलते हुयी कुदरती गतिविधियों की अहम भूमिका है। नये-नये शोध- अध्ययन प्रमाण हैं कि धरती के आंतरिक कोर की सतह पर महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव हो रहे हैं। साउथर्न कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के शोध से यह खुलासा हुआ है कि धरती के आंतरिक कोर की गतिविधियां किस तरह धरती के दिनों की लम्बाई को प्रभावित कर रही हैं। इससे धरती के आकार में बड़े बदलाव की प्रबल संभावना है। इसके परिणामस्वरूप इसकी सीमाएं स्थानांतरित हो सकती हैं। यह खतरनाक स्थिति का संकेत है। यह कहना है वरिष्ठ पत्रकार, ख्यात पर्यावरणविद एवं इंडियन ट्राइबल सोसाइटी कम्यूनिकेशन सिस्टम रिसर्च सेंटर के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ज्ञानेन्द्र रावत का। उन्होंने बातचीत के दौरान बताया कि अब ग्लोबल वार्मिंग केवल पर्यावरण और सेहत के लिए ही खतरा नहीं रह गयी है। यदि अब धरती चार डिग्री सेल्सियस गर्म होती है तो दुनिया को 40 फीसदी गरीबी में बढ़ोतरी का सामना करना होगा। यह लोगों की व्यक्तिगत संपत्ति के लिए भी बड़ा खतरा है। यह पहले के अनुमानों की तुलना में चार गुणा ज्यादा नुकसान है। इसकी मार से ठंडे देश भी नहीं बच सकेंगे। यह स्थिति तब है जबकि बीते तीन दशकों में धरती की तीन चौथाई जमीन शुष्क हो चुकी है। इससे कृषि उत्पादन में गिरावटआयेगी, उद्योग धंधों पर असर पड़ेगा, ऊर्जा संकट और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च बढे़गा, साथ ही प्राकृतिक आपदाओं से बीमा प्रीमियम और वेश्विक व्यापार पर व्यापक असर पड़ेगा। यदि धरती को बचाना है तो सभी देशों को पहले से ज्यादा गंभीरता और तेजी से कदम उठाने होंगे। कारण जलवायु परिवर्तन के चलते विनाश की घड़ी की टिक-टिक हमें यह बताने के लिए काफी है कि अब बहुत हो गया,अब हमें कुछ करना ही होगा अन्यथा बहुत देर हो जायेगी और उस दशा में हाथ मलते रहने के सिवा हमारे पास करने को कुछ नहीं होगा ।
आज धरती एक बडे़ संकट के मुहाने पर खडी़ है। यहां सबसे बडा़ सवाल यह है कि आखिर कैसे बचेगी हमारी धरती। क्योंकि धरती को बचाने के सात उपाय तो नाकाम हो गये हैं। इनमें पहला है पृथ्वी का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ने से रोकना, दूसरा कार्यात्मक अखंडता, तीसरा सतह के जलस्तर का उपयोग, चौथा भूजल स्तर घटने से रोकना, पांचवां नाइट्रोजन का सीमित उपयोग, छठा फास्फोरस का सीमित उपयोग और सातवां ऐरोसोल प्रमुख है।
इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि भारत सहित दुनिया के कुछ हिस्से, यूरोप और अफ्रीका के कुछ हिस्सों के साथ-साथ हिमालय का तलहटी वाला क्षेत्र इन उपायों के उल्लंघन के फलस्वरूप हाटस्पाट बन गये हैं।
असलियत यह है कि अभी तक छह बार धरती का विनाश हो चुका है। अब धरती एक बार फिर सामूहिक विनाश की ओर बढ़ रही है। इसलिए समय की मांग है कि हम अपनी जीवन शैली में बदलाव लाएं, प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करें, सुविधावाद को तिलांजलि दे बढ़ते प्रदूषण पर अंकुश लगाएं अन्यथा मानव सभ्यता बची रह पायेगी, इसकी कल्पना ही बेमानी है।