
गर्मी अपने चरम पर है। सूरज की तपिश जैसे धरती को झुलसा रही हो। पोखर,तालाब, कुएँ – सब सूख चुके हैं। गाँवों में तो हालत और भी खराब है। पशु-पक्षी पानी की एक बूँद के लिए तरस रहे हैं, इधर-उधर भटक रहे हैं लेकिन कहीं राहत नहीं मिलती।
यह दृश्य केवल एक गाँव या क्षेत्र का नहीं है, यह पूरे देश की स्थिति को दर्शाता है। जहाँ इंसान के पास बोतलबंद पानी और एसी कमरे की राहत है, वहीं प्रकृति के बाकी जीव बिना आवाज़ के तड़प रहे हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि जो लोग इन हालातों के ज़िम्मेदार हैं – वे ठंडे एसी ऑफिसों में बैठकर मीटिंगों में “सस्टेनेबिलिटी” पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई से अनजान या फिर अनदेखी कर रहे हैं।
तालाब सूखना सिर्फ एक मौसमी संकट नहीं, यह चेतावनी है – प्रकृति की ओर से। हमने वर्षों तक जल-स्रोतों का शोषण किया, हरियाली काटी, और अब जब जवाब मिल रहा है, तो हम आँखें फेर रहे हैं।
जरूरत है कि हम अब भी चेत जाएँ। वर्षा जल संचयन को अपनाएं, पुराने जल स्रोतों को पुनर्जीवित करें और वृक्षारोपण करें। साथ ही, ज़िम्मेदार अधिकारियों को भी एसी कमरों से निकल कर जमीन पर उतरना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं जब सिर्फ इंसान ही नहीं, पूरी पृथ्वी प्यास से कराहेगी।
अंत में, यह सवाल हम सब से है – क्या हम सिर्फ तमाशबीन बने रहेंगे, या कुछ ठोस कदम भी उठाएंगे?
✍️ मनोज यादव “पत्रकार”