रसूखदार लोगों से न्यायालय द्वारा क्या एक बड़ा हजार्ना नहीं वसूला जाना…?

निर्दोष लोगों की बाइज्जत बरी..!

रसूखदार लोगों से न्यायालय द्वारा क्या एक बड़ा हजार्ना नहीं वसूला जाना…?

न्याय की बात तो सब करते हैं न्याय मिलता भी हैं! तो इतना समय लग जाता हैं कि वह न्याय पाने वाला अपना सब कुछ खो देता हैं जो बेगुनाह होकर भी इतना लंबा समय जेल की सलाखों के पीछे खर्च कर देता है!
बात सिर्फ कफील खान की नहीं, बल्कि बात उन बहुत सारे बेकसूर लोगों की है, जिन्हें देश-समाज के रसूखदार लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए बलि का बकरा बना कर जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा देते हैं। ऐसे कई लोगों की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा जेल में कट जाता है। लंबे समय तक उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में देरी के कारण जेल में मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, जिसका दंश शायद वह ताउम्र झेलता है। जेल में डाले गए ऐसे निर्दोष लोगों को कुछ वक्त बाद अदालतें बाइज्जत बरी भी कर देती हैं, तो क्या उस व्यक्ति पर लगा सामाजिक लांछन उसे चैन से जीने दे पाता है?कारावास के दौरान उसके परिवार के सदस्यों को जो आर्थिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़ते हैं, उसकी जवाबदेही कौन लेता है? से छूट कर अपनी खोई हुई सामाजिक प्रतिष्ठा से अगर वह समझौता कर भी ले तो उसकी खोई हुई नौकरी या फिर उसका डूबा हुआ व्यापार कब तक उसके जीवन को पटरी पर ला सकेगा, यह अंदाजा लगाना भी बेहद मुश्किल होता है। क्या यह हमारे देश के पुलिस तंत्र और न्यायपालिका की व्यवस्था की असफलता नहीं है?इस प्रकार किसी का जीवन तबाह कर देना क्या किसी संवैधानिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ नहीं है? ऐसी स्थिति में मिथ्या अभियोग लगा कर कानूनी दांवपेच में उलझाने वाले उन रसूखदार लोगों से न्यायालय द्वारा क्या एक बड़ा हजार्ना नहीं वसूला जाना चाहिए, ताकि भुक्तभोगी या पीड़ित के जीवन को दुबारा पटरी पर लाने में सहूलियत मिल सके?

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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