
एटा ! डा. सौरभ राजपूत ने बताया है कि निराश्रित गौवंश आश्रय स्थल कों भी “गौशाला ” बोला जाता है, कई जगह पर गौशाला का बोर्ड भी लगा रहता हैँ, जिससे सरकार विरोधी और शरारती तत्वों द्वारा भ्रम फैलाया जाता हैँ कि सरकारी गौशालाओं मे गायों की दुर्दशा हो रही हैँ, गाय मर रही हैँ, आम आदमी सामान्य गौशाला और निराश्रित गौवंश आश्रय स्थल के मध्य अंतर नहीं कर पाते,
समाधान –
जिस तरह से इंसानों के घर और वृद्धाश्रम मे अंतर होता हैँ, ठीक ऐसे ही निराश्रित गौवंश की देखभाल वाले स्थान का आधिकारिक नामकरण ठीक तरह से होना चाहिए , नाम ऐसा हो जो अनपढ़ व्यक्ति भी आराम से याद रख सकें, आम बोलचाल की भाषा मे नाम सरल होना चाहिए ऐसे स्थलों का नाम ” गौ सेवा सदन ( गायों का वृद्धाश्रम ) ” होना चाहिए, जिससे आम व्यक्ति आराम से समझ सकता है कि यह वह गौ वंश है जो उनके मालिकों ने उपयोगिता खत्म होने के बाद बूढ़े गौ वंश कों मरने के लिए आवारा छोड़ दिया हैँ, जिससे एक्सीडेंट की घटनायें हो रही थी और खेतोँ कों नुकसान हो रहा था, सड़क किनारे दुर्घटना की शिकार होकर मर रही थी,
ऐसे बूढ़े गौ वंश कों उनके जीवन काल के अंतिम समय मे संवेदनशील सरकार और सरकारी व्यवस्था द्वारा सेवा की जा रही हैँ, जिसके लिए सरकार बधाई की पात्र हैँ कि ऐसे निरीह और बेज़ुबान गौवंश की पीड़ा समझी जिनको उनके मालिकों ने दूध पीने के बाद बेसहारा छोड़ दिया था l