भारत में पत्रकारिता को आजाद कैसे किया जा सकता है?

नई दिल्ली।

आज पत्रकारिता की बिगड़ती हालत पर भारतीय मीडिया फाउंडेशन के संस्थापक एके बिंदुसार ने कहा कि सत्य बहुत कड़वा है पर अगर भारत में पत्रकारिता को सचमुच आज़ाद करना है और उसे वापस 1851 से 1950 तक के पुराने अनमोल सीधे सच्चे व मासूम दौर में लाना है तो पीत पत्रकारिता, झूठ को सच बनाने वाली, सच की भावनाओं से खिलवाड़ करके ब्लैकमेल करने वाली व ऊँची टी आर पी के लिए बिना पूरा सच जाने आधी अधूरी जानकारी के आधार पर पाठकों के चटकारे से पीड़ित को बदनाम करने वाली पत्रकारिता को कठोर दंड से दण्डित करने वाले क़ानून लागू करने के लिए ईमानदार, भले व साहसी पत्रकारों को आगे आना होगा जिस दिन ऐसी क्रांति आएगी भारतीय पत्रकारिता ऐसे ही आज़ाद हो जाएगी जैसे 1851 से 1950 तक थी, पत्रकारिता का वो स्वर्ण युग वापस लौट आएगा. पहले घटना की तह तक जाओ सत्य खोजो फिर बिना डरे सच लिखो ये बहादुरी का कार्य है न कि केवल भ्रामक आरोपों के आधार को कुछ पाने की लालसा में ऐसा रंग दो कि पीड़ित को अपनी जीवनलीला ही समाप्त करनी पड़े, क़्या आपने इस बात पर गौर किया है कि आत्महत्या करने वालों में 5% पीड़ित ऐसे होते हैं जो झूठे प्रकरणों में फंसाए जाने पर जाँच पूर्व ही उन्हें मीडिया द्वारा उनके चरित्रहनन किये जाने के कारण अपनी प्रतिष्ठा धूमिल होने से बदनामी के कारण अपनी जीवन यात्रा ही समाप्त कर देते हैं।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक मीडिया की तुलना में सोशल मीडिया को अधिक व्यापक रूप से सुलभ और शीर्ष-डाउन नियंत्रण के लिए अधिक प्रतिरोधी माना जाता है। सोशल मीडिया विश्लेषण, टिप्पणी और वकालत के रूप में और जांच और क्राउडसोर्सिंग के माध्यम से जानकारी प्रदान करके भ्रष्टाचार से लड़ता है। सोशल मीडिया “नागरिक पत्रकारिता” के लिए एक आउटलेट प्रदान करता है क्योंकि ऐसे कई सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म हैं जहाँ नागरिक भ्रष्टाचार के बारे में जानकारी दे सकते हैं, जिसकी जाँच फिर सरकारी अधिकारियों या पत्रकारों द्वारा की जाती है। सोशल मीडिया एक तरह से जनमत को भी जुटा सकता है जिससे विशेष मुद्दों के साथ नागरिक जुड़ाव बढ़ता है । भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में नागरिकों को शामिल करने में सोशल मीडिया के सकारात्मक प्रभाव के बावजूद, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि समकालीन मास मीडिया प्लेटफ़ॉर्म दुरुपयोग के लिए असुरक्षित हैं, जिससे नागरिकों के बीच गलत सूचना का निरंतर प्रसार हो सकता है। खास तौर पर, सोशल मीडिया के ज़रिए फैलाई जाने वाली झूठी सूचनाओं का बढ़ता प्रचलन – जिसे “फर्जी समाचार” के रूप में जाना जाता है – मुख्यधारा और स्वतंत्र मीडिया आउटलेट दोनों में जनता के भरोसे के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। फर्जी खबरें न केवल गलत जानकारी फैलाती हैं, बल्कि अक्सर दुर्भावनापूर्ण इरादे से भी इस्तेमाल की जाती हैं, उदाहरण के लिए भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाने वाली हथियारबंद रिपोर्टों के माध्यम से उनकी ईमानदारी पर संदेह जताकर राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करना, या भ्रष्टाचार के मामलों की सही रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को बदनाम करना है।
इस तरह के दुरुपयोग का मुकाबला करने के लिए पूरे समाज के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता होती है, जो फिर से पहले बताई गई सामूहिक कार्रवाई की समस्याओं को ध्यान में लाता है।

About The Author

निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

Learn More →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अपडेट खबर के लिए इनेबल करें OK No thanks