जख्म बस्तियों में कराह रहे हैं—और दवाएं सड़कों पर बांटी जा रही हो—

,जख्म बस्तियों में कराह रहे हैं—
और दवाएं सड़कों पर बांटी जा रही हो—
फिर कौन सुने गूंगों के दर्द की चीखें–
जब सुनने बाले ही बहरे हो–
इस पोस्ट को पढ़ जरूर लेना पर अपने अमूल्य वजन मत खर्च करना गरीबों पर क्यों आपकी पावर नाराज हो सकती है–
एक पार्टी एसे विचारों की भी होना जरूरी है जिसमें समस्याएं सुनने बाले हर वर्ग के इंसान सामिल हो धर्म नहीं जन हिताय कार्य हेतु इंसान—
जहां विवाद रहित अपने भावनाओं को सम्मान से पीड़ित बाहर ला सके अपनी बात सादगी के साथ अपनी समस्या को पेस कर सके और समाधान के लिए हर संभव कोशिश की जाए स्वयं से लेकर अदालतों तक इनकी बात रखने में इंसाफ के साथ इनके साथ सहयोग में हर संभव सामिल हो जिससे अधिकारों का हनन और ठगी और सही उपयोग हो सके-इस पार्टी में एसे योग्य मान्यता प्राप्त सामिल होने चाहिए जहां समस्याओं का समाधान करना आसान हो सके फिर बो चाहे समाज के किसी भी स्तर के क्यों न हो इसका कोई धर्म नहीं जन हिताय स्वार्थ रहित इंसान होना जरूरी है–
हम देख रहे हैं बस्तियों के भीतर लोग अपने अधिकारों की ठगी अपनी खुली आंखों के सामने होते देखते रहते हैं अंधों की तरह पर असहाय की तरह उनके साथ बो मजबूरी होती है जिसको बो वहां तक नहीं ले जा सकते हैं जहां इन्हें इंसाफ मिल सके-इस कमजोरी में कई बातें और मजबूरियां भी सामिल है, सबसे पहले शिक्षा, हौसला,जानकारी, और अधिकारियों से बात करने में भय,कारण हम सभी जानते हैं, अशिक्षित व्यक्ति यह तक नहीं जानता कि उसके अधिकारों में है क्या और इसका फायदा आज भर पूर हर वर्ग का इंसान उठा रहा है जहां से इनके अधिकार रिलीज होते हैं, सरकारी योजनाएं गरीबी दूर करने के लिए कम नहीं है फिर भी गरीबी क्यों नहीं खत्म हो रही है क्यों आज भी फुटपाथों और झोपडी़ में इंसान पड़े हैं क्यों सोंच के समय जाती महिलाएं अमानुषों का शिकार हो रही है, क्यो कि निचला सिस्टम सबसे बड़ी सरकारें है जो इनके लिए बैठी है गरीबों का खून पीने के लिए और सर्मनाक तब और हो जाता है कि बस्तियों के बीच जाकर इनकी आप बीती कोई नहीं सुनता है और गरीब अयोग्य बिचारा भला कहां जानता है कागज कैसे तैयार किया जाता है अपने अधिकारों के लिए पहली बात गांव की पाठशाला में अ,आ,इ,ई, और मां तक योग्यता में पब्लिक आज भी ठहरी हुई है और एसे इंसान शहर से गांव तक हर जगह पर मौजूद हैं तब इनके अधिकारों के कागज पर अंग्रेजी– कितना फायदा है न इसको मुख्य धाराओं से हकीकत–यही है कि यह अंग्रेजी आम और गरीब के लिए बो सुरंग है जो खुलेआम अशिक्षित और कम शिक्षित आम इंसान का खून खेचने बाली सुरंग– कर पीने की सबसे बड़ी शक्ति है, सरकारें किसी भी रही हो पर आम आदमी हमेशा अपने अधिकारों से वंचित ही रहा है, इनके हिस्से का खाने बाले हमेशा हर सरकार— में तैयार रहते हैं आज सरकारी आवास हो या शौचालय इनमें झांक कर देखा जाए तो कागजी घोड़े हर साल दौड़ कर लौट आते हैं न इनके हाथ का लोटा छूटा न छत नशीव हो सकी 12,13,साल के प्रयास के बावजूद भी पब्लिक का हाल वहीं है जिसकी लाठी,और सिफारिश उसे तो डबल फायदे उपलब्ध है और जरूरत मंद आज भी लाइन में लगा हुआ है अपनी अपनी बारी के इंतजार में पर बारी गरीब की
नहीं आती है– बस्तियों में भी कम राजनीति नहीं हो रही है अंधों में काने– और इनकी दूसरी आंख के लिए तो सारी रौशनी उपलब्ध है पर समाज में दवे कुचले इंसानों के लिए कुछ एसी पार्टियों का गठन सुरक्षा के साथ योग्य विश्वसनीय इंसानों के लिए बनाई जाए और एक जगह निश्चित उपलब्ध कराई जाए जहां फरियादी खुलकर अपनी फरियाद रख सके बिना भय और बिना संकोच के साथ–
अपराध सड़कों पर हमेशा रहा और पब्लिक घरों में भय के साथ, गरीब की कोई जाति नहीं होती है उसकी सुनने बाली एक पार्टी का गठन मान्यता प्राप्त समाज हित में निस्वार्थ कार्य करने बालों को सामिल सुरक्षा सुविधा के साथ होना आवश्यक हो चला है इस विषय पर जिम्मेदारों को गहराई के साथ सोचने की आवश्यकता है, क्यों कि समस्याएं सामने पड़ी है मुंह फाड़े पर सिस्टम देखकर भी— जुवाने कितनी भी तेज आवाजों में भीड़ के साथ मिलकर चिल्लाएं झूठे काम को जन्म देने के लिए पर काम बोलता कम है और दिखाई ज्यादा देता है, यह समिति कुछ एक समस्याओं को नहीं रख सकती है अपने एजेंडे में जो मुख्य न्यालय के द्वारा ही–
बाकी हर बो जरूर मंद समस्या का समाधान और लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए प्रयास रत इमान के साथ हो आज सरकारों से ज्यादा तो निचले सिस्टम पावर फुल है जो इंसानों के अधिकार इंसान के पास पहुंचने से पहले ही बीच में गायब हो जाते हैं और बो उम्मीद और आशाओं में खाली हाथ रह जाता है, मुट्ठी भर सत्य को सुरक्षित रखना जरूरी है वरना अब धरा भी बोझ से कराहने लगी है प्रकृति का कोप बे मौसम कहर ढा रहा और उसमें सामिल इंसान के तो जलवे ही निहारे है आज इतने अपराध और मत भेद समाज में हो गये है कि अकेली अदालतें भी समाधान करने में हांपने लगी है तब समाज के ठग और समाज से ही सुरक्षा और न्याय प्रिय जिम्मेदारों का सिस्टम तैयार करना बेहद जरूरी हो चला है,जिसके बीच बैठकर गरीब और आम इंसान अपनी समस्या को भय मुक्त बोल सके जिन्हें अपने अधिकारों के खजाने भी एक दूसरे से पूछ कर मिलते हो एसे उन बड़े और बूढ़े अनाड़ी मासूमों इंसानों के अधिकारों के लिए लड़ सके बस्तियों में जाकर–एसी एक पार्टी होने की आज बहुत आवश्यकता है।
लेखिका-पत्रकार-दीप्ति चौहान‌।✍️

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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