
एटा-किताबो की महफिलों से–
कल कलम के किरदारों से बात क्या हुई–
जैसे सुकून की रात चल कर साथ आ गई–
नींद में तन छोड़कर बिस्तर पर हम–
जैसे खोई जिंदगी लौट कर फिर आ गई–
किरदारों में जमने बाला बीज कहां मिटता है–
*जिसको करे पसंद धरा बो बीज कहां मिटता है–“
नजरों के उठने से पहले–
बोल उठीं ये मूंक किताबें–
बिन पूछें नजरों ने समझ ली–
क्या चाहती है किताबें–
कुछ मजहब का कत्ल देखकर–
रौंदें गले से बोली किताबें–
मत फाड़ो बो पन्ने मेरे मिल कर–
बैठ लिखी थी किताबें–
धरा के सीने पर जो बना है–
बो एक मुसाफिर खाना–
वहीं जन्मी है किताबें–
भांति भांति के रंग रूप से–
संवरी सजी किताबें–
कुछ पन्ने घायल होंगे कुछ अंग भंग–
कुछ लहू में नहाए,गीली होगी किताबें–
कुछ प्रेम-विवाह के अफसाने–
कुछ अधूरी मिलन की तढपन–
जुवां पर वफा कांपती होंगी किताबें–
घायल जिस्म ओढ़नी घायल–
मौन मुस्कराती नारी जैसी होंगी किताबें–
कुछ प्रेम त्याग की दीवानी–
कुछ सत्य के चीर हरण बक्त के हाथों–
कोमल नारी मर्दानी होंगी किताबें–
कच्चा जिस्म और वस्त्र उघारी–
नौंच ने बाले गिद्धों की कहानी होंगी किताबें–
किताबों के बाजार में कदम रखने से पहले एसा लगा जैसे कितने बिछड़े हुए अपने बुला रहे हो अपनी अपनी भाषा में,अपनी अपनी गुजरी बात सुना रहे हो कि इधर आओ नहीं तुम इधर नहीं तुम मेरे पास बैठो तुमसे बहुत कुछ कहना है शायद तुम मुझे सुन सकती हो जैसे कि साक्षात एक भीड़ सामने हो और कहती हो कि पहले मेरी बात सुनो पहले मेरी बात सुनो और मैं घूम घूम कर उन्हें कभी हंसते कमी रोते हुए सुन रही हूं–
हां कल मैंने किताबों को बिना आंखें खोले पढ़ा है जैसे कि कह रही हो आज के हालातों से ताजा जख्म लिए कराह-कराह कर आप बीती कि मेरे बच्चों तुम कहां के लिए निकल पड़े हो और कहां जा रहे हो–
जहां तक मैंने देखा है बो लक्ष्य हीन मंजिलें हैं जहां मानव नहीं जाते हैं–
वहां की भूंख मांस है और प्यास लहू जमीन और जननी की लासों को कुचल कर जा रहे हो वहां की जमीन बंजर है जहां कभी कभी शूल अंकुरित जरूर हो जाते हैं पर जीव-जंतु और मानव नहीं फिर भी तुम इस अंतिम लक्ष्य हीन मंजिलों पर जाना चाहते हो तो अवश्य–पर तुम जिन लासों को पांवों से कुचल कर आगे जा रहे हो तो तुम अपने कंधों पर अपनी-अपनी जिंदा लाशें रखकर- अवश्य जाओ उस विनाशी मुर्दे खाने मे— क्यों तुम जमीन और जननी मां दोनों की कोखे कुचल कर आगे हदों के पार जा रहे हो उस जमीन पर न कुर्सी है न मकान, न पैसा है न मानव सिर्फ एक काला अंधेरा है जिसकी कोई भोर ही नहीं है।
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ये जहां खुद मुसाफिर खाना है–
न जाने क्यों अहम के घर बना बैठे हैं हम–
चंद घंटों के लिए दो गज जमी होगी–
देह की राख ठंडी होने तक–
वसीयत क्यों समझ बैठे हैं हम–
जाने किस हवा की फूंक से गुम जाएगी–
ए राख मुट्ठी भर हमारे जिस्म की–
इसे क्यों खुदा का घर समझ बैठे हैं हम–
लेखिका-पत्रकार-दीप्ति चौहान।