
डेमोक्रेसी की यही प्राब्लम है। कितनी ही कमजोर हो जाए ; भले ही परमानेंट खटिया पकड़ ले ; भले ही रह-रह के बेहोश हो जाती हो ; पर जब तक सांस रहेगी, तब तक विपक्ष वालों की कुछ-न-कुछ किच-किच बनी ही रहेगी। अब बताइए, योगी जी को भी संभल के मामले की जांच करानी पड़ेगी। और जांच भी ऐसी नहीं कि पुलिस वालों की जांच पुलिस वालों से ही करा लें। सेवानिवृत्त ही सही, हाई कोर्ट के जज की अध्यक्षता में जांच करानी पड़ेगी। यानी जांच में कुछ हो न हो, भले ही जांच को एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन पर मिलता जाए और अनंतकाल तक चलती जाए, पर जांच का स्वांग पूरा होगा। बहुत जल्दी न सही, पर एक दिन जांच कमेटी संभल की मस्जिद देखने भी जाएगी और अधिकारियों को अपनी बात रखने के लिए बुलाएगी भी। गोली चलाने वालों की भी सुनेगी और गोली खाने वालों की भी। यानी और कुछ हो न हो, कुछ-न-कुछ होने का माहौल बना रहेगा। कागज का पेट भरता रहेगा। बेचारे पुलिसवालों के घावों को कुरेदा जाता रहेगा। ये अच्छी बात नहीं है।
हम तो कहते हैं कि जांच-वांच की जरूरत ही क्या थी? एकदम ओपन एंड शॅट केस है। हिंदुओं ने शिकायत की, उनका कोई मंदिर खो गया था, बहुत पहले। लगता है मस्जिद में बंद कर के रखा हुआ है। किडनैपिंग का केस बनता था, सो जिला अदालत ने मुस्तैदी दिखाई। हाथ के हाथ आर्डर दे दिया, मस्जिद में छान-बीन कर लो। छान-बीन के लिए टीम भी बना दी। केस सीरियस था, सो पुलिस-प्रशासन ने भी मुस्तैदी दिखाई। फटाफट छान-बीन टीम को लेकर मस्जिद में पहुंच गये। छान-बीन टीम ने छानबीन कर भी ली, पर शिकायत करने वाले का मन नहीं भरा। चार दिन बाद, छान-बीन टीम और ज्यादा लोगों के साथ दोबारा पहुंची। पर इस बार कानून के अपना काम करने में रोड़े अटकाने के लिए मुसलमान इकट्ठे हो गए। लगे जय श्रीराम के जवाब में जय श्रीराम की जगह, अल्लाह-ओ-अकबर के नारे लगाने। भीड़ को भगाने के लिए बेचारे पुलिस वालों ने लाठियां चलायीं, तो लगे ईंट-पत्थर चलाने। पुलिस वालों ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया, पर उनके पास हाथ कम पड़ गए। हार कर बेचारे पुलिस वालों को आत्मरक्षा के लिए गोलियां चलानी पड़ीं। उपद्रवी भागने के बजाए, गोलियों के रास्ते में आ गए ; कुछ मारे गए और कई घायल हो गए। इतना सिंपल तो मामला है, इसमें जांच क्या करनी है? मरने वाले, घायल होने वाले उपद्रवी, मारने वाले कानून के रक्षक! गोली क्यों चलायी? अव्वल तो पुलिस ने गोली चलायी ही नहीं, गोली चलायी भी, तो आत्मरक्षा के लिए चलायी और कानून के शासन की रक्षा के लिए भी। इसी के लिए तो उसे बंदूक दी है ; बंदूक सिर्फ दिखाने के लिए थोड़े ही दी है।
ऐसी जांच-वांच से तो पुलिस के हौसले ही कमजोर होंगे और उपद्रवियों के हौसले बढ़ जाएंगे। और ये जो समाजवादी पार्टी वालों ने मरने वालों के लिए पांच-पांच लाख रुपए की मदद देने का एलान किया है, उससे तो उपद्रवियों के हौसले और भी बढ़ जाएंगे। पुलिस की गोली यानी परिवार वालों को लखपति बनाने की गारंटी! इस तरह तो उपद्रवियों में पुलिस की गोलियों का भी डर नहीं रह जाएगा। पट्ठे समाजवादी, सरकार से और मांग कर रहे हैं कि वह भी मरने वालों के परिवारों के लिए लाखों रुपए के मुआवजे का एलान करे। यानी पुलिस की गोली का डर एकदम ही खत्म हो जाए! शुक्र है योगी जी ने अब तक किसी मुआवजे या सहायता का एलान नहीं किया है। देना ही होगा, तो पुलिस वालों को अच्छे निशाने के लिए इनाम देंगे, पर उपद्रवियों को मुआवजा कभी नहीं देेंगे!
— राजेंद्र शर्मा