
यह चित्र बाते नहीं हो सकता है. यह चित्र महज चित्र नहीं हो सकता है। यह चित्र एडिट नहीं हो सकता है। जो प्रशासन कुर्सी पर बैठ कर अगर बड़ी-बड़ी बाते करता है तो महज नशा समान होंगी।
इस चित्र में एक बड़े भूभाग के खंड में खड़ा बेजुवान पेड़ है जिसके लिए सरकार ने अरबो रूपये खर्च कर दिए होंगे और जिलाधिकारी एटा ने कई सो मीटिंग ली होंगी.
इस पेड़ का कसूर महज यह है कि इसने एटा जैसे प्रशासन की देख रेख में जन्म लिया है। और दुर्दशा पर रो भी नहीं पा रहा है।
यह पेड़ जिलाधिकारी एटा को भी शुद्ध हवा दें रहा होगा ही. लेकिन जिला प्रशासन को तो गमलो में रखे पेड़ो से प्रेम हो गया है तो इनकी क़ीमत क्या होंगी आप जनता समझ सकते है।
इस पेड़ की दुर्दशा के कारण जिला प्रशासन अधिक है. भू माफिया कम है!. भू माफिया इसलिए दोषी नहीं है क्योंकि वो तहसील स्तर पर रूपये दें रहें है तो क्यों दोषी होंगे।
लेकिन दोष हम जैसे पत्रकारों का है जो इस दुर्दशा पर लिखने में भी कलम को खींच रहें है। मंच पर बैठ कर और लाल फीता को काट कर माइक पर बड़ी बड़ी बातों की लम्बी लाइन खींचने वाले जिले के जिम्मेदारो से पूछना है इस पेड़ को, कि क्या इसका जीवन बचना जरुरी नहीं है।
2000 बीघा जमीन की मिट्टी का खनन जिले में तस्वीरों के साथ हो गया हो और जिले के अंदर अधिकारियो के नाम लेकर मिट्टी खनन हो रहा हो तब यह लिखना भी जरुरी है कि जो भी जनप्रतिनिधि यह करा रहा है उसके नाम के साथ और उसके सहयोगी के साथ खबर लिखी जानी भी तय है क्योंकि अपराध कराना और करना दोनों ही एक ही श्रेणी में आता है।
यह एक पेड़ समझने की गलती न की जाये इसके दर्द के मरहम का इंतजाम नहीं होने तक. खबर को लिखा जायेगा।
पी एस राजपूत