
सवालों के घेरे में सी एच ओ की सेवा समाप्ति का प्रकरण ?
*सी डी ओ की अध्यक्षता बाली दूसरी जांच सी एम ओ को कवर फायर देने जैसा प्रयास
*एक माह तक आयुष्मान आरोग्य मंदिर का ताला लगा कर बंद किए जाने बाली कार्यवाही पर कोई टिप्पणी दूसरी जांच में नही की गई ?
*आखिर इसका दोषी कौन क्या बता सकेगा बड़े अफसरों का जांच दल ?
एटा। “उसी का शहर, वही मुद्दई बही मुंसिफ,हमे यकीन था हमारा कसूर निकलेगा।” किसी शायर की यह पुराना शेर जिले के बहुचर्चित प्रकरण पर सटीक बैठता है।पूरे डेड माह तक स्वास्थ प्रशासनिक हलकों में सरगर्म रहे दलित सी एच ओ बरखा के प्रकरण का पटाक्षेप जांच प्रक्रिया से जुड़े अफसरों ने कथित आरोपी अफसरों के हक में करके पीड़ित के आरोपी को बड़ी कारीगरी से द्रकिनार कर दिया । गत दस जुलाई एवम तैइस जुलाई को जिलाधिकारी प्रेम रंजन सिंह के समक्ष आयुष्मान आरोग्य मंदिर कामसान पर तैनात अनुसूचित जाति की महिला कम्यूनिटी हेल्थ ऑफिसर बरखा ने जबरन उसके सेंटर पर ताला डालने जाति सूचक अभद्र व्यवहार एवं यौन उत्पीडन के प्रयासों का जिक्र करते हुए मुख्य चिकित्सा अधिकारी सहित कई कर्मियों को आरोपित करते हुए शिकायतें प्रस्तुत की थी। इन्ही आधारों पर एक वीडियो वायरल हुआ था। जिस पर जिलाधिकारी एटा ने एटा ने एस डी एम की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की थी। एस डी एम एटा की जांच रिपोर्ट पांच अगस्त को जब डी एम प्रेम रंजन सिंह को मिली तो उन्होंने तेरह अगस्त को मुख्य चिकित्सा अधिकारी को आदेशित करते हुए कह–बरखा के सेवा विस्तार का स्थान प्रथम दृष्टया विसंगति की ओर इंगित करता है।इसके साथ ही आयुष्मान आरोग्य मंदिर कामसान का अकस्मात ताला लगाने की कार्यवाही से भी जनमानस मिलने बाली सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। जिलाधिकारी प्रेम रंजन सिंह ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को निर्देशित करते हुए कहा— तत्काल आयुष्मान आरोग्य मंदिर कामसान का ताला खुलवा कर स्वास्थ सेवाओं को बहाल किया जाए। ओट एक पक्षीय रूप से बिना जांच के सुश्री बरखा की सेवाओं का स्थगन न किया जाए।
डीएम के उक्त आदेश के क्रम में बरखा को सी एम ओ ने कई दिनों बाद इक्कीस अगस्त डाक से आदेश दिया गया पर उक्त सेंटर का ताला नही खोला गया। इस क्रम में उत्पीड़ित बरखा बताती हैं वाइस अगस्त को योगदान करने बाद भी ताला नही खोला गया जिसकी सूचना सी एम ओ डीएम तथा समंधित अधीक्षक को लिखित रूप में दी।। परन्तु विभागीय अधिकारियों को मिली भगत से ताला नही खोला गया। इस क्रम चौकाने बाली बात यह रही सी एम ओ डी एम के आदेश के अनुपालन में कम मुख्य विकास अधिकारी द्वारा चलाई जा रही जांच के नतीजे आने की प्रतीक्षा करते रहे। क्योंकि पूर्व योजना के तहत उन्हें एस डी एम सदर की जांच को चुनौती देनी थी।
इस लिए इकतरफा जांच के नोटिस अपने कार्यालय से जारी करते रहे और निरर्थक सवाल जबाव कर जांच पूरी करा ली। जिसको मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में संपन्न जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में
रखा हुआ बता कर पुनः बरखा की सेवा समाप्त करने की संस्तुति कर दी। स्मरण रहे उक्त बैठक इकत्तीस अगस्त को आयोजित की गई जिसमे जिलाधिकारी प्रेम रंजन सिंह सम्मलित नही दिखे। यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि स्वास्थ समिति की बैठक में अनुमोदन या नए प्रस्ताव नही रखे जाते अपितु बाद में फाइलों को आगे बढ़ाया जाता है। उक्त बैठक में सर्व सम्मति हेतु कोई चर्चा नही की गई।यहां यह सवाल उठता है इकतीस अगस्त की बैठक में जब जिलाधिकारी नही मौजूद थे। तो उनके द्वारा आदेशित प्रकरण पर पलटवार मुख्य विकास अधिकारी को आगे करके क्यों किया गया ? जिलाधिकारी के आदेश तेरह अगस्त के क्रम में डेड माह तक बंद रहे आरोग्य मंदिर सेंटर की जिम्मेदारी मुख्य विकास अधिकारी की जांच समिति ने किस पर डाली ? जबकि जिलाधिकारी ने स्वास्थ सेवाओं के नन्द होने पर बहाल करने के निर्देश दिए और यह माना की स्वास्थ सेवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। आखिर इसके लिए जिम्मेदा कौन है जांच दल इस तथ्य को क्यों अनदेखा कर गया ? असल में दूसरी जांच को मुख्य चिकित्सा अधिकारी को कवर फायर देने (बचाने) जैसा प्रयास है जिसमे बड़े अधिकारी सफल हुए हैं। अपनी सरकारी सेवाओं को अधिकारियों के उलझाने वाले आदेशों के मकड़जाल गंवा बैठी बरखा घोर हताशा और सिस्टम पर विश्वाए खो चुकी है। जो महिला आयोग सहित कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी।वही अफसरों के इस एकतरफा कार्यवाही से जन साधारण में घोर निराशा व्याप्त हुई है।