दिल के दौरे के दोगुने मामले सर्दी के दिनों में होते हैं

दिल के दौरे के दोगुने मामले सर्दी के दिनों में होते हैं*

बात स्पष्ट है कि बदलती जीवन-शैली के साथ हृदय रोग के प्रति लोगों को जितना सचेत रहना चाहिए, उतना वे नहीं रहते। ऐसा नहीं है कि हृदय संबंधी शिकायतें केवल भारत में बढ़ रही हैं। तुर्की के एक विपक्षी नेता हसन बिटमेज का गुरुवार 14 दिसंबर को निधन हो गया। इजरायल के विरुद्ध अपना भावपूर्ण भाषण देने के बाद वह मंच पर ही गिर पड़े थे और उनकी भी उम्र महज 54 साल थी।

ऐसे अनेक वीडियो हैं, जिनमें लोग नाचते-चलते या बोलते-बोलते ही हृदयाघात के शिकार होते दिखते हैं। क्या हमारी दुनिया हृदय रोगों से मुकाबले के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है? भारत में तो हृदय रोग को लेकर ज्यादा अध्ययन नहीं हुए हैं, मगर अमेरिका में हुए अध्ययन से पता चला है कि जाड़े के दिनों में दिल के दौरे की शिकायत में 30 प्रतिशत तक वृद्धि हो जाती है। कुछ डॉक्टर बताते हैं कि गरमी के दिनों की तुलना में दिल के दौरे के दोगुने मामले सर्दी के दिनों में होते हैं। पारंपरिक रूप से अगर हम देखें, तो भारत में भी बूढ़ों के लिए सर्दी के मौसम को चिंताजनक बताया जाता है। 15 दिसंबर से लेकर मकर संक्रांति के पहले तक अनेक लोगों की रातें बहुत मुश्किल से कटती हैं। ऐसे में, सर्दियों में सेहत के प्रति ज्यादा जागरूकता अनिवार्य है। सही खान-पान के अलावा अपनी दिनचर्या भी ऐसी रखनी चाहिए, ताकि शरीर में स्वाभाविक रूप से ऊष्मा बनी रहे। शरीर चलाना और ज्यादा से ज्यादा पैदल चलना जरूरी है, जबकि लोग जाड़े में एक जगह सिमटे रहना पसंद करते हैं।

वैसे पिछले तीन वर्षों से भारत में हृदय संबंधी शिकायतों को कोविड महामारी से जोड़कर भी देखा जा रहा है। चिकित्सकों की सलाह भी है कि जिन लोगों को कोविड हुआ था, उन्हें कुछ वर्ष सतर्कता के साथ बिताने चाहिए, ज्यादा शारीरिक मेहनत से बचना चाहिए। आंकड़े गवाह हैं कि भारत में अकेले 2022 में दिल के दौरे में 12.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2021 में 28,413 लोगों की दिल के दौरे से मौत हुई थी, जबकि साल 2022 में 32,457 लोगों की मृत्यु हुई। सबसे दुखद तो यह है कि दिल के दौरे के लगभग आधे मामले ‘साइलेंट’ होते हैं, जिसको लोग समझ भी नहीं पाते हैं। हृदय संबंधी शिकायत किसी भी उम्र में हो सकती है। चिकित्सक सलाह देते हैं कि शरीर के सूक्ष्म संकेतों पर ध्यान देना चाहिए। बुनियादी रूप से यह माना जाता है कि किसी भी तरह का तनाव लेना घातक हो सकता है, लेकिन शारीरिक सक्रियता से किसी भी तरह के तनाव को संतुलित किया जा सकता है। बचाव के तमाम चिकित्सकीय उपायों से ज्यादा जरूरी है, अपने शरीर में हो रही तकलीफ की दूसरों से चर्चा करना, ताकि सही परामर्श और उपचार तक पहुंच सुनिश्चित हो सके।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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