*झोला छाप ख़बरी*
*चाहे कीतने भी बड़े पत्रकार हो निष्पक्ष पत्रकारिता सम्भव नही अगर नीजि क्षेत्र से जुड़े है तो राजनीतिक दलों के गुंडे जीवित नही रहने देंगे …?*

आजकल ज्यादातर जो लोग पत्रकार कहे जाते हैं, वह दरअसल पत्रकार के चोले में सुविधाभोगी बाबू हैं जैसा कि सरकारी संस्थानों में होते हैं। जिस तरह सरकारें आती जाती रहती हैं और सरकारी बाबूओं की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, उसी तरह तथाकथित पत्रकार होते हैं। ये वो चींटे हैं ,जो जहां गुड देखते हैं, चिपक लेते हैं। मेरा कहना कदापि न मानें। इस क्षेत्र से जुड़े होने के कारण यह मेरा निजी अनुभव के बाद का आकलन है, लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में भारत की पत्रकारिता का 114 वां स्थान है। जबकि इस निर्धारण प्रक्रिया में अधिनायकवादी और गैर-लोकतांत्रिक देश पहले से ही बाहर है।इससे अन्दाजा लगा लीजिए कि भारत के ज्यादातर पत्रकार कैसे हैं ?
भारत में अधिकांश पत्रकार दो समूहों में बंटे हैं— एक जिन्हें मोदी ईश्वर के अवतार नजर आते हैं और दूसरे, जिन्हें मोदी ,दानव के अवतार नजर आते हैं और दोनों ही बातें गलत है। परंतु, निष्पक्ष रूप से मोदी के कार्यों का मूल्यांकन करने वाले पत्रकार एवं पत्रिकाओं को न क्रेता मिलेंगे न विज्ञापन दाता, फिर अखबार चलेगा कैसे ? हम यदि निष्पक्ष,निभ्रिक एवं कर्मठ पत्रकार एवं पत्रकारिता चाहते हैं, तो हमें उसका मोल चुकाना होगा, पांच रुपए का अखबार लेकर हम जिम्मेदार पत्रकारिता की आशा नहीं कर सकते। पत्रकारों के गलत आचार विचार की मैं चर्चा नहीं करना चाहता, परंतु, इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, सिर्फ घुप्प अंधेरा नहीं है, रोशनी के कुछ चिराग भी जल रहे हैं। मुट्ठी भर ही सही, परंतु कुछ पत्रकार हैं, जो पूरी शक्ति के साथ सच्चाई एवं न्याय के लिए संघर्षरत रहते हैं,चाहे उनकी जान ही क्यों न ले ली जाए। वे राजनीतिबाजों, अपराधियों, नौकरशाहों एवं अनैतिक धन्ना सेठों से बिना भयभीत हुए सत्यान्वेषण में अहर्निष लगे रहते हैं……?
पत्रकारिता में केवल समाज के प्रति ज़िम्मेदारी बनती है, सच्ची पत्रकारिता करते हुए अपने अंतर्मन से पूछना चाहिए क्या मैं ठीक कर रहा हूँ ? किसी को ईमानदारी साबित करने की ज़रूरत नहीं होती। पत्रकारिता पर जब से व्यवसायिकता की प्रेत छाया पड़ी है तब से निरन्तर ह्रास हो रहा है। यह कहाँ जा कर रुकेगा कोई नहीं कह सकता….?
कुछ ही पत्रकार है जिनका ज़मीर ज़िन्दा है क्योंकि यह सरकार से सवाल भी पूछते हैं और गलत नीतियों का विरोध भी करते हैं तथा सरकार के सही काम की सराहना भी कहते हैं। अगर सरकार के खिलाफ बोलना गलत है तो फिर भारत में कोई भी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकार नहीं है…?
ईमानदारी राजसुख़ भोगने से नही होती दर दर भटक कर कागज़ के चंद टुकड़ो को जोडक़र जब एक किया जाता है तब सत्ता हिलती है और जब सत्ता डगमगाती है तब एक पत्रकार समाज को आइना दिखते हुए बदनाम हो जाता है ….औऱ उसपर विपक्षी दल का ठेकेदार होने का ठप्पा चिपका दिया जाता है …..?
में खुल कर लिखता हूँ मुझे लोग पागल समझते है अधिकत लिखने के लिए समय रात्रि में मिलता है तो लोग मुझे शराबी बोकते है …मुझे इन सब बातों से कोई फ़र्क नही पड़ता में पूरी निष्ठा से अपने काम को करता हूं ….ईमानदारी की परिभाषा को परिभाषित करना यही है कि अपने काम के प्रति निष्ठा हो आपका आत्म विश्वास डगमगाने की जगह अटल हो और मौत भी सामने हो तो टकराने पहले एक बार सोचे