पहले राष्ट्र के लिए काम किया अब सन्यासी बन धर्म के लिए काम कर रहे हैं

इंसान अपने जीवन में सारी मेहनत भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति करने में लगा देता है। मूलभूत आवश्यकताए पूरी हो जाने के बाद भी इंसान एक मार्ग पर आकर रुक जाता है। जिसके बाद वो अपनें जीवन में सुख ढूंढ़ता। लेकिन मुंबई महाराष्ट्र के कल्याण ताल्लुका के छोटे से उल्हासनगर से निकले जन्मे स्वामी योगेश्वरानंद गिरी तलवेजा कॉलेज से कॉमर्स की उपाधि लेकर सनातनी की सेवा कर रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए धर्म के प्रचार को लेकर आगे बढ़ रहें स्वामी गिरी कहते हैं बदलते युग में अगर परिवर्तन हो रहा है तो आपको भी समय के साथ परिवर्तित होते रहना चाहिए। सोशल मीडिया के जरिए स्वामी सनातनी का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। स्वामी योगेश्वरानंद गिरी कहते हैं सनातनी प्रचार को लेकर उन्होंने सांसारिक मोह माया को त्याग कर सन्यासी का जीवन जी रहे हैं।
स्वामी जी कहते हैं संसार में अधिक राग और मोह ईश्वर प्राप्ति में बाधक है। इसलिए त्याग ही उस परमसत्य को पाने का सहज और सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। त्याग से ही महापुरुषों ने संसार को प्रकाशमान किया है। जिसने भी जीवन में त्याग की भावना को अंगीकार किया उसने ही उच्च से उच्च मानदंड स्थापित किए हैं। सच्चा सुख व शांति त्यागने में है न कि किसी प्रकार कुछ हासिल कर लेने में। गीता में भी कहा गया है कि त्याग से तत्काल शांति की प्राप्ति होती है और जहां शांति है वहीं सच्चा सुख है।
स्वामी गिरी नें बताया परंपरा से चार आश्रमों का पालन करते हैं। सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर निष्काम भाव से प्रभु का निरन्तर स्मरण करते जिसमें सात पीढ़ी आश्रम में आती रही हैं। ब्राह्मण कुल में जन्मे स्वामी जी कहते हैं बचपन से ही पूजा पाठ का शौक रहा। कॉमर्स से स्नातक की उपाधि लेने के बाद परिवार वाले साइंस लेकर साइंटिस्ट बनाना चाहते थे। हालांकि स्वामी जी की ख़ुद की भी तमन्ना वैज्ञानिक बनने की थी।11वीं कक्षा में विवेकानंद से प्रेरित होकर उनके बताए भार्ग का अनुसरण करना शुरू कर दिया।स्वामी जी नें विवेकानंद की पुस्तकों का गहन अध्ययन किया। उसके बाद रामकृष्ण मिशन से जुड़ गए। स्वामी विवेकानंद से इतने प्रभावित हुए कि उनकी आज तक वों यात्रा जारी हैं।
स्वामी जी का परिवार मिडल ईस्ट के दुबई में व्यापार करता था जिसके चलते स्वामी जी ने अपने बड़े भाई के साथ व्यापार किया। पारिवारिक स्थिति संभालने के लिए स्वामी जी ने नौकरी की। लेकिन इस बीच स्वामी जी ने अपने गुरु का दामन भी नहीं छोड़ा परम पूज्य स्वामी भूतेश्ववानंद स्वामी जी के गुरु रहे।गुरुजी ने कहा था पहले राष्ट्र के लिए कम करो उसके बाद जब ऊपर वाले की इच्छा होगी खुद संयासी बन जाओगे।

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पं.सत्यम शर्मा

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