
आगरा से क़रीब 60 किमी दूर खानवा में बाबर का मुक़ाबला राणा सांगा के राजपूत गठबंधन से हुआ। बाबर के पास पचास हज़ार से कम सैनिक थे जबकि राजपूतों की संयुक्त सेना दो लाख से ज़्यादा थी। इस फौज में हसन ख़ां मेवाती के 12 हज़ार मुस्लिम राजपूत और महमूद लोदी के 10 हज़ार अफग़ान फौजी भी थे जो बाबर से सिकंदर लोदी की हार का बदला लेना चाहते थे। 17 मार्च, 1527 को जब लड़ाई शुरू हुई तो राजपूतों का पलड़ा भारी था। लेकिन अचानक जंग का रुख़ बदल गया। रायसेन के राजा शिलादित्य उर्फ सिलहदी अपने 35 हज़ार पूरबिया राजपूत सैनिकों के साथ बाबर से जा मिला। राणा की फौज में भगदड़ मच गई और 10 घंटे में ही बाबर की ज़बरदस्त जीत हुई। इसके बाद सही मायने में भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव पड़ी। अब राणा सांगा द फादर ऑफ ग्रेट राणा प्रताप का अंत भी सुनिए। राणा फिर बाबर से भिड़ने की योजना बनाने लगे। पिछली लड़ाई मे भारी नुक़सान उठाए राजपूत घबरा गए। राणा के साथियों ने उन्हें 30 जनवरी 1528 को ज़हर दे दिया। वो इस बात से भी ख़फा थे कि बाबर को भारत में आने का न्यौता स्वंय राणा सांगा ने ही दिया था। राणा स्वर्ग सिधार गए और विदेशी बाबर के तोपख़ाने की आवाज़ और ज़ुल्म के शोर में राजपूत राजाओं की गद्दारी की तमाम कहानियां दफ्न हो गईं। अल्लाह अल्लाह, ख़ैर सल्ला।।