
एटा,यह मानव सभ्यता के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है कि वैज्ञानिकों को कृत्रिम गर्भाशय विकसित करने में सफलता मिल गई है। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने बाकायदे वीडियो जारी करके दुनिया को दिखा दिया है कि कृत्रिम गर्भाशय का भविष्य उज्ज्वल है। इसके विकास में वैज्ञानिक वर्षों से लगे थे और अब इंसानी शिशुओं को विकसित करने के लिए इस वैज्ञानिक प्रयोग को आधिकारिक मंजूरी का इंतजार है। कृत्रिम गर्भाशय के वीडियो में एक बाल रहित, पीली चमड़ी वाला मेमना तरल पदार्थ से भरे एक बड़े आकार के सैंडविच बैग में स्वस्थ लेटा दिख रहा है। पेंसिल्वेनिया में चिल्ड्रेन हॉस्पिटल ऑफ फिलाडेल्फिया (सीएचओपी) के शोधकर्ताओं ने साल 2017 का भी एक वीडियो जारी किया है। यह चर्चा विगत पांच वर्ष से चल रही है और वैज्ञानिक पशुओं के बाद अब इंसानों में इस तकनीक का प्रयोग करना चाहते हैं। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) विनियामक विचार कर रहा है। चर्चा के लिए 19-20 सितंबर को खास बैठक होने वाली है। वैज्ञानिक सोच के साथ निर्णायक विद्वानों की सोच का मिलना जरूरी है, ताकि इस प्रयोग के इंसानों में होने पर नैतिकता या मानवता पर कोई बुरा असर नहीं पड़े।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर ऐसे कृत्रिम गर्भाशय की जरूरत क्यों पड़ रही है? सीएचओपी के भ्रूण सर्जन एलन फ्लेक, जो इस अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं, ने कहा है कि यदि यह प्रयोग उतना सफल होता है, जितना हम सोचते हैं तो अधिकांश जोखिम भरे गर्भधारण की समस्या से निपटा जा सकेगा। कमजोर नवजात शिशु जन्म के तुरंत बाद वेंटिलेटर पर पहुंचने के बजाय इसी कृत्रिम गर्भाशय में पहुंचकर नया जीवन पाएंगे, पूर्ण विकसित होकर जन्म लेंगे। यह सच है कि बड़ी संख्या में कमजोर शिशुओं की मौत हो जाती है। कई बार किसी शिशु का जीवन गर्भ के अंदर ही संकट में पड़ जाता है, उसे बचाने में चिकित्सक भी नाकाम हो जाते हैं, इस नाकामी ने ही चिकित्सकों को प्रेरित किया है कि वे कृत्रिम गर्भाशय विकसित करें, ताकि संकट में पड़े शिशुओं को नया जीवन दिया जा सके। इस कृत्रिम गर्भाशय को एक्सटेंड नाम दिया गया है और वैज्ञानिकों को लगता है कि सरकारें इस प्रयोग को मानवता के हित में मंजूरी दे देंगी। खासकर जो शिशु 28 सप्ताह के गर्भकाल से पहले ही जन्म लेते हैं, उनका जीवन बचाना बहुत आसान हो जाएगा।
साल 2019 से इस प्रयोग में काफी तेजी आई है और इसके लिए फिलाडेल्फिया स्थित एक स्टार्ट-अप कंपनी, विटारा बायोमेडिकल ने 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर जुटाए हैं। न्यूयॉर्क शहर के कोलंबिया यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर की बायोएथिसिस्ट और नियोनेटोलॉजिस्ट केली वर्नर अफसोस जताती हैं, ‘यह निश्चित रूप से एक रोमांचक कदम है और ऐसे कार्यों में भी काफी समय लग गया है, जो कृत्रिम-गर्भ तकनीक विकसित करने से जुड़े नहीं हैं।’ वाकई, जब तक कृत्रिम गर्भाशय के इंसानों में प्रयोग को मंजूरी मिलेगी और प्रयोग सफल होगा, तब तक न जाने कितने शिशुओं को मानवता गंवा देगी। साल 2020 में दुनिया भर में लगभग 13.40 करोड़ ऐसे शिशुओं का जन्म हुआ, जिनमें समय से पहले जन्म लेने के कारण जटिलताएं थीं। ध्यान देने की बात है कि साल 2019 में दुनिया में लगभग 9,00,000 मौतें इसी वजह से हुई थीं। ऐसे में, एक सुरक्षित कृत्रिम गर्भाशय मानव जाति के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा।