
आज विश्व ओजोन दिवस है
ओजोन परत की सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में जागरूकता फैलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की पहल पर यह दिवस मनाया जाता है। यह सही है कि ओजोन परत को इंसानी गतिविधियों से कुछ नुकसान पहुंचा है, लेकिन इसको लेकर जितना विलाप किया जाता है, और विकास-कार्यों को दोषी ठहराया जाता है, वह उचित नहीं है। अगर विकास-कार्य ही इसका मूल कारण होता, तो अब ओजोन की परत सुधरने क्यों लगी है? पिछली सदी के सातवें दशक में वैज्ञानिकों ने ओजोन परत में क्षय होने की बात कही थी। बताया गया था कि इसमें छिद्र हो रहा है, जबकि पृथ्वी से 10-50 किलोमीटर तक मौजूद यह परत सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है। अब रिपोर्ट बताती है कि इसका छेद छोटा हो गया है। आकलन है कि साल 2000 से ओजोन परत का यह छेद 40 लाख वर्ग-किलोमीटर छोटा हुआ है, और इसी रफ्तार से क्षतिपूर्ति होती रही, तो वर्ष 2050 तक यह छिद्र पूरी तरह से बंद भी हो सकती है।
नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक शोध में यह भी कहा है कि ओजोन परत के नुकसान के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले एक केमिकल के उत्सर्जन में कमी आई है, जिसके कारण ओजोन परत की सेहत ठीक होने लगी है। इस उत्सर्जन के कम होने से अंटार्कटिका के ऊपर तेज हवाओं के बनने वाले भंवर का भी खिसकना बंद हो गया है और वह विपरीत दिशा में जाने लगा है। साफ है, ओजोन परत में धीरे-धीरे ही सही, लेकिन लगातार सुधार हो रहा है। इसके ठीक होने का एक अन्य सुबूत यह भी दिया जा रहा है कि साल 2022 में उष्ण और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ओजोन का स्तर सामान्य से अधिक था। फिर, पिछले कुछ वर्षों से ओजोन छिद्र के दिखने की घटनाओं में भी देरी देखी जा रही है, जो संकेत है कि ओजोन परत धीरे-धीरे पुराने रूप में आने लगी है।
इन सबके बीच यह मूल सवाल बना हुआ है कि विकास-कार्यों की कीमत यदि ओजोन परत चुका रही थी, तो उसकी दशा और खराब होनी चाहिए थी। मगर ऐसा नहीं हुआ, अलबत्ता उसमें सुधार ही हो रहा है। यह संकेत है कि विकास-कार्यों को कठघरे में खड़ा करने के बजाय उन कारकों की पड़ताल की जाए, जिनसे ओजोन परत को नुकसान पहुंचता है। ऐसी गड़बड़ियों को दुरुस्त करके हम निश्चित तौर पर ओजोन परत को शत-प्रतिशत ठीक कर सकते हैं। वैज्ञानिक संभवत इसी दिशा में काम कर रहे होंगे।