युग पुरुष श्रीकृष्ण

कृष्ण के दो पक्ष हमारे सामने हैं। एक पक्ष अवतार की बात करता है। कृष्ण के चमत्कार की बात करता है और कृष्ण को परमात्मा सिद्ध करता है। इस पक्ष के अनुसार ऐसी अलौकिक लीलाएं व कार्य सिर्फ ईश्वर स्वयं अवतार लेकर ही कर सकते हैं । दूसरा पक्ष योगीराज कृष्ण को युगपुरुष बताता है।
प्रायः धर्म की आलोचना करने वाले ओशो भी योगेश्वर कृष्ण को युगपुरुष के रूप में स्वीकार करते हैं। वह कृष्ण जैसा युगपुरुष किसी अन्य को नहीं मानते । वह कहते हैं-
कृष्ण हुए तो अतीत में लेकिन हैं भविष्य के। अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ से बाहर हैं। कारण यह है कि कृष्ण अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं। उदास नहीं हैं और न रोते हुए। कृष्ण ही हैं जो अकेले ही नाचते हुए, हंँसते हुए, गीत गाते हुए व्यक्ति हैं। कृष्ण अकेले हैं जो दमनवादी नहीं है। वे जीवन के सभी रंगों को स्वीकार कर लिए हैं। वह प्रेम से भागते नहीं, पुरुष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते । वह प्रेम और करुणा से भरे होते हुए भी युद्ध में लड़ने की सामर्थ्य रखते हैं ।उनका चित्त अहिंसक है किंतु हिंसा के ठेठ दावानल में उतर जाते हैं। वह अमृत की स्वीकृति हैं किंतु जहर से कोई भय नहीं मानते ।वह मर्यादाओं में बंधे हुए नहीं अपितु पूर्ण स्वतंत्र हैं।
वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी युगपुरुष कृष्ण के संबंध में कहते हैं- कृष्ण जैसा सर्वगुण संपन्न और पाप रहित आदर्श चरित्र अन्यंत्र कहीं नहीं है। न किसी देश में, न किसी इतिहास में और न किसी काव्य में।
स्वामी दयानंद सरस्वती अपने ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं-
महाभारत के श्री कृष्ण जैसा अलौकिक पुरुष जिसने कोई पाप नहीं किया और उस जैसा इस पूरी पृथ्वी पर कोई दूसरा कभी-कभी जन्म लेता है।
युगपुरुष गवाक्ष पुस्तक के लेखक श्री श्यौराज सिंह यादव ने भी अपनी पुस्तक में श्री कृष्ण को युगपुरुष सिद्ध करते हुए उन्हें योगीराज, मल्लविद्या में पारंगत, आदर्श मित्र, तपस्वी, युद्ध कौशल निपुण, सुदर्शन चक्र धारी, क्रांति का अग्रदूत ,राजनीतिज्ञ ,कूटनीतिज्ञ, शांतिदूत, महाबली, अजेय और गीता के उपदेशक के रूप में सप्रमाण प्रस्तुत किया है।
कृष्ण के प्रति जो भ्रांतियां फैलाई गईं वे आज तक चली आ रही हैं। चोर, लंपट रणछोड़, व्यभिचारी, चरित्रहीन, रास रचैया, कुब्जा से समागम करने वाला, चीर चुराने वाला कहने वाली इन भ्रांतियों ने कृष्ण के उज्जवल चरित्र पर काला धब्बा लगाया है ।राधा नाम की स्त्री के साथ उनके प्रेम प्रसंग को भी चटखारे ले कर गाया गया है। जबकि इन बातों का प्रामाणिक ग्रंथ महाभारत में कहीं उल्लेख नहीं है ।
इन भ्रांतियों को पैदा करने में कतिपय पुराणों ,श्रंगार के कुछ कवियों व कथावाचकों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जो कृष्ण योगीराज है जिसने किशोरावस्था में कंस को मल्लयुद्ध में पछाड़ा हो वो रासबिहारी बनकर गोपियों (अपने ही गाँव की बहन बेटियों)के साथ रासलीला कैसे कर सकता है। इन्द्रियों के संयम पर वह स्वयं गीता में कहते हैं-
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
भीष्म पितामह श्री कृष्ण को युगपुरुष मानते हुए पांडवों द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ में प्रथम अर्घ देने के लिए उनके नाम का प्रस्ताव रखते हैं और कहते है
नृणालोकंहिअन्योनास्ति विशिष्ट केशव हते।
इस प्रकार कृष्ण यज्ञ की प्रथम आहुति के लिए चुने जाते हैं। इसी यज्ञ में व्यवस्था हेतु जब विभिन्न कार्यभार सौंपे जाते हैं तो कृष्ण आगंतुक अतिथियों के धूल सने पैर धोने और उनकी झूठी पत्तलें उठाने का कार्यभार लेते हैं । ऐसी सेवा का कार्य युग पुरुष कृष्ण ही ले सकते हैं।
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