
@, दीप्ति की कलम से—-
लाभकारी योजनाएं किसके लिए है इंसानों या मुर्दों के लिए—-
क्या है यह बीमा पॉलिसी योजना मृत्यु के पश्चात किसको लाभ होता है जो दुनियां छोड़ जाता है उसको या उसके परिवार को जीते जी मजदूर की तरह अपने कर्म और फर्ज में जिंदगी गंवाने वाला कोई भी इंसान परिवार के साथ न देने पर दुख दर्द न समझने पर एक लावारिस सा जिंदा अपने कंधों पर अपनी लास लिये घूमता फर्ज निभाता रहता बो इंसान जो मृत्यु के पश्चात सफेद हांथी बन जाता है आज इंसान की आर्थिक सोच ने रिस्ते नातों से मुंह मोड़ लिया तन्हाइयों में समिटती जिंदगी की सांसों का सौदा भी तब होता है जब संसाधनों के अभाव मे कोई इंसान दुनियां ही छोड़ जाता है भरे पूरे परिवारों में आज लगभग हर सदस्य लावारिस जिंदगी जी रहा है क्यों—फिर ये लाभकारी योजनाएं जिंदा इंसान के लिए होनी चाहिए या मुर्दों,और उन खून के नालायक परिवार और रिस्तों के लिए सवाल विचारणीय है परिवर्तन हर तरफ है तो यहां क्यों नहीं हमने देखा है सरकार की योजनाओं में पलते बो बुढ़ापे जो एक हजार मासिक पेंशन से रोटी कपड़ा और मकान निवालों से ज्यादा दवाएं खाते हुये बो भी तीसरे-चौथे माह में हजारों चक्कर बैंकों के लगाते छड़ी के सहारे जो कभी फर्ज निभाते निभाते कंधे झूल गये और उंगलियों में रह गये गिनती में रिस्ते और इंसान आज इंसान और जानवर की सेम जिंदगी हो रही है आप अगर झूंठ मानते हैं तो लगाइए वृद्धाआश्रम और गौशालाओं के चक्कर इन योजनाओं की हवेलियों के अंदर दम घुटती भूख से मरती संसाधनों के अभाव में तड़पती जिंदगियां जी रही है फिर चाहे आदमी की हो या जानवरों की सोच का परिवर्तन आज इंसांन के अधिकारों से लेकर सांसों तक का—फिर मृत्यु के पश्चात इन योजनाओं का लाभ कौन ले रहा है जीते जी लावारिस रही जिंदगी या रिस्ते और समाज यह सवाल सर्वोपरि विचारणीय है ये हम नहीं जरूरतों की पुकार है।