कविता– बांध लिया है जीवन...!
बांध लिया है जीवन को, बसने लगे दर्द के डेरे!
उगा नहीं सूर्य अभी तक ,जस के तस छाए अंधेरे!

चलते -चलते, मन का नाता , मैंने तुमसे जोड़ा है!
कदम-कदम पर भावुकता में,अपना जीवन मोड़ा है!
मगर चल दिए हाथ झाड़ कर तुम, लेकर सारे हिस्से!
छीन लिया सब कुछ मेरा तुमने,बने पीर के किस्से!
रातें कटती हैं, तन्हाई में, आती याद सबेरे!
बांध लिया है जीवन को…….!
कितना प्यार भरा आमंत्रण था ,जी मेरा आपका !
लेखा -जोखा कर बैठा मैं,जाने क्यों संताप का!
ओ मेरे हम-राही, मैं भी हूं,इतनी हिम्मतवाला!
तेरे लिये मैंने,अपना सब कुछ,न्यौछावर कर डाला !
तुझे भुलाने की कोशिश में,जीते हैं सपने तेरे !
बांध लिया है जीवन को …!
निज मन की इच्छा को,दुल्हन जैसी तैयार किया था !
भावों के दर्पण में ,निज मूरत का श्रृंगार किया था !
मन-मेलों के इन दौरों में ,अभिलाषा रही अधूरी!
मिली नहीं खुशियां मुझको, जग में ,हुईं न चाहत पूरी !
उभर आते हैं वो चित्र, जो मानस- पट पर अंकित मेरे !
बांध लिया है जीवन को …!
दिया नहीं आसरा मुझको, न जाने किसके कहने में !
हर पल सुख भोगा तुमने, टीस मिली मुझको सहने में!
उम्मीदों का आंचल पाने ,ताक रहा है मेरा मन !
जीवन की सूनी गलियों में झांक रहा है मेरा मन!
पांवों को मंजिल मिल जाए, कब से ये नजरें हेरे !
बांध लिया है जीवन को….! ** महेंद्र भट्ट (कवि -लेखक -व्यंगकार)