राजवीर सिंह राजू भईया सांसद एटा सांसद अपने परिवार के साथ महादेव का रुद्राभिषेक एवं पूजा अर्चना करते हुए

*शिवत्व की साधना, पढ़िए श्रावन मास पर विशेष*

*मनुष्य के अंदर दैवीय -आसुरी प्रवृतियों के बीच संघर्ष चलता रहता है। वह जब शिव परमात्मा से योगयुक्त होकर ज्ञान अमृत को आत्मसात करता है और आसुरी अवगुण रूपी विष को शिव अर्पण करता है तब शिव उसके सभी विष हर लेते हैं. आइए ब्रह्मा कुमारी शिवानी जी से जानते हैं क्या है सावन के पवित्र महीने का महत्व*

राजवीर सिंह राजू भईया सांसद एटा सांसद अपने परिवार के साथ महादेव का रुद्राभिषेक एवं पूजा अर्चना करते हुए,

मनुष्य के अंदर दैवीय व आसुरी प्रवृतियों के बीच संघर्ष चलता रहता है। वह जब शिव परमात्मा से योगयुक्त होकर ज्ञान अमृत को आत्मसात करता है और आसुरी अवगुण रूपी विष को शिव अर्पण करता है तब शिव उसके सभी विष हर लेते हैं. क्या है सावन के पवित्र महीने का महत्व
हर कर्म का आरंभ संकल्प से होता है। बातों को बनाने, बिगाड़ने व संभालने का आधार भी हमारा सोच रूपी कर्म है। अच्छे या बुरे सोच के कारण हमारे कर्म और कर्मफल सुखदायी व दुखदायी होते हैं। इसलिए कहते हैं, परमात्मा शिव अपनी शुद्ध और श्रेष्ठ संकल्पों से सोच को परिष्कृत कर दुनिया को परिवर्तित देते हैं। उनका प्रत्येक संकल्प मानवता का कल्याण व सद्ज्ञान है, जिसकी वर्षा से प्रकृति में शांति, संतुलन, सद्भावना व प्रसन्नता का वातावरण निर्मित होता है। मानव जीवन व संसार से विकार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, पापाचार, दुख, कष्ट व हिंसा के ताप समाप्त होते हैं। परमात्मा के इस सृष्टि परिवर्तन या उद्धार कार्य से कृतज्ञ होकर हम श्रावण मास में भगवान शिव की पूजा-अर्चना और व्रत-उपवास करते हैं। शिव की महिमा स्मरण, गायन, पूजन व श्रवण से श्रावण मास शिवमय हो जाता है। कहते हैं, चातुर्मास के आरंभ में भगवान विष्णु जब शयन में चले जाते हैं, तब परमात्मा शिव संसार की बागडोर संभालते हैं।

शिव निराकार ज्योति स्वरूप हैं। वे शिव ज्ञान व योग सिखाकर मनुष्यों में सतयुगी दिव्य गुण व दैवीय संस्कारों को पुनः विकसित करते हैं। निराकार ज्योतिर्लिंग शिव को स्थूल शिवलिंग मूर्ति के रूप में स्थापित किया जाता है और उनके दिव्य वाहन नंदी को बिठाया जाता है। कहा जाता है कि नंदी के कान में भक्तों द्वारा कही गई बात परमात्मा शिव तक पहुंचती है। जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, तब सृष्टि को बचाने एवं भक्तों की शुद्ध भावनाओं और कामनाओं का फल देने हेतु शिव अदृश्य रूप में संसार का कार्यभार संभालते हैं। ज्ञान सूर्य ज्योति स्वरूप शिव अपने ईश्वरीय ज्ञान व शिक्षा के प्रकाश द्वारा मनुष्यों के आसुरी अवगुणों को सद्गुण, दैवी चरित्र व दैवी संस्कारों में बदलते हैं।

श्रावण मास भगवान शिव के सृष्टि परिवर्तन कार्य का यादगार पर्व है। इस मास में मनुष्य में देवत्व उत्पन्न हो जाता है और दानवत्व का अंत होता है। श्रावण मास में हुए सागर मंथन का उल्लेख शास्त्रों में आता है। इसका भावार्थ है कि हर व्यक्ति में विचार-मंथन चलता रहता है। मनुष्य के अंदर दैवीय और आसुरी प्रवृतियों के बीच खींचतान होती रहती है। मनुष्य जब शिव परमात्मा से योगयुक्त होकर ज्ञान अमृत को आत्मसात करता है और आसुरी अवगुण रूपी विष को शिव अर्पण करता है, तब शिव उसके सभी विष हर लेते हैं और उसे दैवीयगुण युक्त बना देते हैं। प्रत्येक सोमवार शिव को समर्पित है, क्योंकि भगवान शिव ने आध्यात्मिक ज्ञान रूपी सोम (चंद्र, अमृत) से विकारों से भस्मीभूत मानव आत्माओं को दैवी गुणों से पुनः जीवित किया था। इसी कारण सावन के महीने में सोमवार के व्रत उपवास का अधिक महत्व है। व्रत का अर्थ है दृढ़ संकल्प और उपवास का मतलब है निकट वास करना अर्थात मन-बुद्धि से सदा परमात्मा के समीप व साथ रहने का संकल्प करना ही सच्चा व्रत व उपासना है, जिससे सभी प्रकार के रोग शोक से मुक्त होकर व्यक्ति सद्गति को प्राप्त करता है।

मनुष्यों का दिव्य ज्योति स्वरूप आत्मा जब परम आत्मा शिव की स्नेहसिंचित स्मृति में रहता है, तब वह सांसारिक दुख, पीड़ा व ताप से मुक्त होकर सदा सुख, शांति, समृद्धि व समर्पण का अनुभव करता है। इसी स्नेहरूपी जल या दूध को परमात्मा शिव को अर्पण करना ही जलाभिषेक या दुग्धाभिषेक है। जल को शीतलता का प्रतीक माना जाता है, अत: जीवन में शीतलता को अपनाना जलाभिषेक है। श्रावण मास में शिव पर गंगाजल अर्पण करना ज्ञान व पवित्रता को जीवन में अपनाना है। दूध सात्विकता का प्रतीक है। दुग्धाभिषेक का अर्थ है सात्विकता को जीवन में धारण कर वास्तविक सुख-शांति का अधिकारी बनना। श्रावण मास में दही और शहद आदि द्रव्यों को भी शिव पर चढ़ाते हैं। दही हमें एकता बनाए रखने का शिव-संदेश देता है। यह हम तभी कर सकते हैं, जब हम शहद की भांति मन, वचन, कर्म से जीवन को मधुर बनाएंगे। शिव को प्रसन्न करने तथा उनसे आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने का मार्ग यही है कि श्रावण में किए जाने वाले कार्यकलापों के अध्यात्मिक अर्थों को जानें और उन्हें जीवन में धारण करें। आशीष तिवारी ज्योतिषाचार्य

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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