जनता पार्टी, जनता दल और अब इंडिया

भारतीय लोकतंत्र में 1977 के और 1989 के आमचुनाव बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। इन दोनों चुनावों में तत्कालीन विपक्ष ने सत्ता पक्ष के बड़े बहुमत को एक नये नाम और नये चुनाव चिन्ह को सामने रखकर धूल चटा दी थी
1975 के आपातकाल के बाद जब 1977 में चुनाव हुए तो किसी राजनीतिक समीक्षक को आभास नहीं था कि कांग्रेस को हराया जा सकता है लेकिन ऐसा हुआ तमाम समाजवादियों, जनसंघियों और वामपंथियों ने जनता पार्टी नाम का संगठन एकत्र किया, बिना किसी नेता की अगुवाई में चुनाव लडा, चुनाव चिन्ह नहीं था तो भारतीय लोकदल का “चक्र में हलधर” मांग लिया, संचार माध्यमों की कमी के बावजूद ये सिंबाल गांव गांव पहुंच गया और देश में पहली बार कांग्रेस पराजित हो गई।
दुबारा, 1989 में भी ऐसा हुआ, कांग्रेस के अब तक के सबसे बड़े बहुमत को चुनौती देते हुए वीपी सिंह अलग हुए, जनता दल का गठन हुआ नया चुनाव चिन्ह “चक्र” मिला, इस दल ने भी तमाम वामपंथियों और भाजपा बन चुके जनसंघ को मिलाकर सत्ता परिवर्तन कर दिया।
उसके बाद सबसे बड़ा बहुमत वर्तमान भाजपा सरकार के पास है, अगले चुनाव के लिए तमाम समाजवादियों, वामपंथियों ने इस बार कांग्रेस का दामन थामा है, नाम मिला है इंडिया, यह नाम इस तेजी से फैला है कि सत्ता से जुड़े लोग भी दो दिन से इंडिया इंडिया कर रहे हैं।
क्या इतिहास फिर अपने को दोहराने को तैयार है, फिर बड़ा बहुमत, फिर तानाशाही, फिर संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग, फिर आम आदमी की तकलीफ़ वैसी ही हैं, क्या जनता फिर से लोकतंत्र स्थापित करेगी।