14 जून को विश्व रक्तदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है
व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य रक्तदान करना चाहिए

14 जून को विश्व रक्तदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है
व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य रक्तदान करना चाहिए

इनमें रक्त की लाल कोशिकाएं हीमोग्लोबिन के जरिये शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक ऑक्सीजन को फेफड़ों से शरीर के प्रत्येक अंग तक पहुंचाती हैं, बिना ऑक्सीजन के जीवित रहना संभव नहीं है, इसीलिए ऑक्सीजन को प्राणवायु कहते हैं। सफेद रक्त कोशिकाएं शरीर की विभिन्न प्रकार के रोगों से रक्षा करती हैं। ये रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए जिम्मेदार हैं। वहीं रक्त कणिकाएं चोट लगने पर खून का थक्का बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। प्लाज्मा एक तरह का तरल पदार्थ है, जो इन कोशिकाओं को अलग-अलग रखने मेें मदद करता है। प्लाज्मा के माध्यम से अनेक पदार्थ, जिनसे शरीर के ऊतकों का निर्माण होता है, एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुंचते हैं। भोजन जैसे कि कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, वसा आदि भी शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचते हैं, जिनसे शरीर को ऊर्जा मिलती है। यही नहीं, प्लाज्मा में खून जमने में मदद करने वाले फेक्टर 8, फेक्टर 9, फाइब्रिनोजन भी पाए जाते हैं, इसीलिए रक्त को जीवन अमृत कहा गया है। इसी प्लाज्मा में कई एंटीबॉडी, इम्यूनोग्लोबुलिंस, हार्मोंस भी होते हैं।

इतिहास में देखें, तो मनुष्य को यह तो ज्ञान हो गया था कि खून के बहने से मृत्यु हो जाती है, परंतु खून कैसे चढ़ाया जाए, इसकी जानकारी नहीं थी। एक व्यक्ति से कैसे खून लेकर दूसरे को चढ़ाया जाए, यह दोनों के लिए जानलेवा होता था। रक्त सफलतापूर्वक चढ़ाने का पहला कार्य डॉक्टर जेम्स ब्लेंडल द्वारा वर्ष 1818 में किया गया। प्रसव होने पर अत्यधिक रक्तस्राव के कारण मरती हुई महिला को उसके पति का रक्त चढ़ाकर ब्लेंडल ने जान बचाई थी। वर्ष 1900 में कार्ल लैंडस्टेनर ने अलग-अलग रक्त समूह की खोज की थी। क्रांतिकारी परिवर्तन आया और जीवन बचाने में ज्यादा सुविधा हुई। वर्ष 1930 में उन्हें रक्त समूह की खोज के लिए नोबेल सम्मान भी दिया गया। वर्ष 1937 में उन्होंने ही आरएच रक्त समूह की भी खोज की थी। उन्हें ‘फादर ऑफ ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन’ कहा जाता है और उनके जन्मदिन 14 जून को विश्व रक्तदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

दुनिया का पहला रक्तकोष या ब्लड बैंक 1937 में अमेरिका के शिकागो शहर में स्थापित किया गया था। 1943 में एसीडी (एसिड साइट्रेट डेक्सट्रोज) भी खोज लिया गया, जो खून को जमने से रोकने व उसको कुछ दिन तक बनाए रखने में सहायक था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय कोलकाता में भारत का पहला रक्त कोष स्थापित हुआ। आज हजारों की संख्या में रक्त कोष हैं। रक्त के अलग-अलग अवयव करके भी एक व्यक्ति के रक्त को कई रोगियों को दिया जाने लगा है। आज शासकीय व निजी, दोनों तरह के रक्तकोष स्थापित हैं।

हरेक स्वस्थ व्यक्ति रक्तदान कर सकता है। दिया हुआ रक्त तीन दिन में शरीर में फिर से बन जाता है। रक्तदान से कोई हानि नहीं होती है, बल्कि एकाधिक जीवन बचाने की खुशी व संतोष होता है। भारत में करीब पांच करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत रहती है, जबकि 2.5 करोड़ यूनिट रक्त ही उपलब्ध हो पाता है। देश में करीब 25 प्रतिशत पुरुष व 57 प्रतिशत महिलाओं में रक्त की कमी देखी जाती है। एक अनुमान के अनुसार, खून की कमी की वजह से भारत में रोज करीब 1,200 लोगों की जान चली जाती है। थैलेसीमिया, हीमोफीलिया, सिकल सेल एनीमिया, एप्लास्टिक एनीमिया, ब्लड कैंसर के रोगियों को बार-बार रक्त की जरूरत होती है। गुर्दे के रोग और डायलिसिस के अलावा बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं के कारण रक्त की जरूरत बढ़ती जा रही है।

इसीलिए यह बार-बार कहा जाता है कि हर स्वस्थ व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य रक्तदान करना चाहिए और हो सके, तो उसे रिपीट ब्लड डोनर के रूप में अपना पंजीकरण रक्तदान केंद्रों पर कराना चाहिए और प्रतिवर्ष रक्तदान करने का संकल्प लेना चाहिए। परिजनों की याद में या अपने जन्मदिन पर अवश्य साल में एक बार रक्तदान करना चाहिए। खून न तो बेचने के लिए है और न बहाने के लिए। यह तो दान देने के लिए है जीवन बचाने के लिए

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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